‘चाची का चबूतरा’ हमारे रोज मर्रा के जीवन से जुड़ी एक सोच है। जीवन के कई छोटे बड़े अनुभवों पर आधारित प्रसंग, कहानी, कविता, संस्मरण इत्यादि चाची के चबूतरे की रौनक रहेगी ।
‘चाची का चबूतरा’ बच्चों के लिए कुछ विशेष है। आज के डिजिटल समय में मशीनी जिंदगी में सब कुछ होते हुए भी एक उबाऊपन सा आ गया है । उम्र का हर पड़ाव एक कुंठा लिए है ।जो कुछ नयी बात नहीं है।
महानगरों में आज के समय में बाल्यावस्था और वृद्धावस्था दोनों ही उपेक्षित है ।
अतीत की यादों पर बना वर्तमान के सवालों से सना और भविष्य के सुनहले सपनों को धरातल देने का एक प्रयास है ‘चाची का चबूतरा’। महानगरीय जीवन शैली को दर्शाती यह वह सोच है जिसमें बाल मनोविज्ञान को समझते हुए कुछ रोचक व ज्ञानवर्धक कविताएँ ‘गाती कहानियों’ के नाम से चबूतरे को मनोरंजक बनाएगी ।
महानगरों में घर अब लोप से हो गए है ,’घर’ जिनमें कमरे भले ही दो हो पर एक छोटा सा आँगन एक छत और एक देहरी अवश्य हुआ करती थी जिस पर बना छोटा बड़ा पत्थर का चबूतरा होता था ।पूरे घर में ये वह स्थान था जिसका इस्तेमाल सबसे अधिक हुआ करता था ।सुबह सवेरे घर का पुरुष वर्ग यहीं बैठा मिलता था। चाय पीते अखबार पढ़ते राजनीतिक चर्चा करते अक्सर नज़र आ जाते थे । बाप बेटा भाई भाई कभी मन से तो कभी अनमने से इकठ्ठे बैठना हो ही जाता था ।डाक लेकर आए डाकिए का वहाँ कुछ पल बैठ कभी कभार पानी पीने के बहाने दो तीन पल यूँ ही सुस्ता लेना या फिर कोई आगन्तुक द्वारा घर का सांकल बजाकर दरवाजे के खुलने का इंतजार करते बैठ जाना , या फिर ग्रह कार्य से फुर्सत पाकर घर की महिलाओं के जमावड़े का अति प्रिय स्थान जहां पास पड़ोस की सखियों के संग मिल बैठ कर मुहँ से बतियाना और हाथों से काम करना सिलाई कढाई बुनाई और दोपहर ढलने तक मिलजुल कर खाना-पीना सीखना सिखाना प्यार दुलार रूठना मनाना ,लड़ाई झगड़े ,ताने उलाहने दो चार दिन मुहँ फेरे बैठे रहना फिर एक हो जाना। गहराई शाम में भाई लोगों के यार दोस्तों का जमावड़ा पिता व दादा को आते देख दोस्तों का उड़न छू हो जाना।
आज के परिवेश में माचिस की डिबिया जैसे फ्लैट जिनकी न कोई छत न कोई आँगन, डरा सहमा सा जीवन जिसमें सरलता कहीं छू नहीं गई। महानगरीय जीवन में पैसा भी हो और समय भी जरा मुश्किल है। इन्हीं कड़ियों को मिलाने की एक कोशिश है ‘चाची का चबूतरा’ ।
तो आए चलिए देखते है कि कैसा और कहाँ है ‘ चाची का चबूतरा ‘ !!!
बड़े शहर की छोटी सड़क उसमें है अनुराग नगर
जिसमें घरौंदा सोसाइटी एक ,बसे जिसमें परिवार अनेक
इसमें इक बरगद का पेड़ रहते जिसमें पक्षी अनेक
बरगद के इस पेड़ नीचे बना हुआ इक चबूतरा
सुबह शाम इसमें लोगों की महफिल खूब जम जाती है,
रौनक इसकी बढ़ जाती जब चाची चबूतरे पर आती है।
इसीलिए अनुराग नगर में ये बरगद बहुत मशहूर हुआ ,
प्रेम से इसको सब कहते है ‘चाची का चबूतरा’

Wow!Bhabhi you have done magic with words …I really loved it. You are a very Aspiring young writer.Keep writing ✍
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Bhaut achai story hai showing love n unity in past time
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A great initiative to keep up our love for our languages 👍🏼
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