‘बसंत पंचमी’ एक याद

                               

आज तो चाची के चबूतरे पर भी रौनक है। वसंत पंचमी मनाई जा रही है। बच्चे और बड़े सभी इधर उधर घूमते फिरते दिखाई दे रहे है। अब लॉकडाउन नहीं होगा ऐसा सरकार की तरफ से ऐलान हो गया है। और सभी स्कूल भी खुल गए है। कुछ बच्चे तो स्कूल बहुत चाव से जा रहे है , और कुछ के लिए मुसीबत लग रही है।
“आज तो कुछ मजेदार होना चाहिए”। चाची की तरफ देखते हुए ललिता ने कहा ।
“इतने स्वादिष्ट मीठे चावल तो आपने खिलाए अभी तक केसर की खुशबू महक रही है कोई मीठी सी बात भी सुनाओ न चाची आज तो बसंत पंचमी है । “ अपने बालों की वेणी को ठीक करते हुए सुजाता ने कहा।
“ मैं अपने बचपन का एक मीठा सा अनुभव सुनाती हूँ । आज के समय से तुलना करो तो ऐसा लगता है कि वह भी क्या जमाना था जिसको सच में जिया था पर आज सपने जैसा लगता है……” कहते कहते चाची ऐसा लगा जैसे किसी सपने में खो गई हो।
सन् 1970 की बात है, दादाजी के बचपन के दोस्त पंजाब के किसी गाँव में रहते थे , जो कई वर्षों से नहीं मिले थे दोंनो बुजुर्ग हो गये थे। । वे दादाजी से मिलना चाहते थे। ऐसा उनके बेटे का खत आया था । ताकीद की गई थी , कि जल्द ही मिलें । चिठ्ठी पढ़ कर दादाजी काफी भावुक हो गए और आनन फानन में वहाँ जाने की तैयारी हो गई। बस इसी बहाने हमें गाँव जाने का मौका मिला । तब से पहले मैंने कभी गांव नहीं देखा था। अभी कुछ दिन पहले ही लोहड़ी और माघी के त्यौहार गए थे । अपने आने की सूचना दादाजी ने पोस्ट कार्ड द्वारा भेज दी । दिल्ली से लुधियाना तक रेलगाड़ी और वहाँ से बस लेकर भारतीय सीमा पर बसा एक छोटा सा पिंड़ था जहाँ हम उतरे । उनके बेटे बस स्टॉप पर हमें लेने आए हुए थे । उन्होनें ने हमें टांगे पर बिठाया और अपने घर ले गये । उस दिन ही बसंत पंचमी थी और खूब सर्दी भी दोपहर का समय था हल्की हल्की रेशमी धूप थी । आसमान रंग बिरंगी पतंगों से सराबोर था तब पता लगा कि बसंत पंचमी के दिन पंजाब में खूब पतंग उड़ाई जाती है। यहाँ भी घर भर के बच्चे और पुरुष पतंग बाजी में लगे थे । संयुक्त परिवार था घर की स्त्रियां रसोई में ही लगी थी कहीं केसरी मीठे चावल सरसों का साग मक्की की मोटी मोटी रोटी घर का बना घी और मीठे के नाम पर घी शक्कर वाली रोटी या गाजर का हलवा घर की बनी पिन्नियाँ धूप में बैठ कर काली गाजर की कांजी का सेवन वाह….! घर के बड़े से आहते में ही एक तरफ कुछ गऊएँ और भैंसें बंधी थी और दूसरी तरफ जमीन में पीली पीली सरसों लहलहा रही थी। किनारे की क्यारियों में हरे हरे मटर लगे थे और इतनी हैरानी हुई कि किनारे पर बनी मेढ़ में मूली लगी हुई थी । हमारे लिए यह सब बहुत नया था। चचेरे दादाजी की एक पोती रंजीता मेरी हमउम्र थी सो वह मेरी सहेली बन गयी वह सब खेल खेल में दिखला रही थी जब उसने मेढ पर बाहर झांकते पत्तों को खींचा तो इतनी लम्बी मूली निकली……वाह…! जो कि मेरे लिए किसी अजूबे से कम न था उसे धोया और खाया जिसका स्वाद मुझे आज तक याद है। मैंने सोचा कि यह लोग किसान है और यही इनका खेत होगा पर रेजीता ने बताया कि यह तो उनके घर के लिए है। उनका खेत तो यहाँ से दूर है बहुत दूर तक चलना पड़ता है, और खेत के पास ही बसंत का मेला लगा है। कल सब मेला देखने जायेंगे । उसने बताया कि मेले में जाने की खूब तैयारी है । रंजीता ने बड़े उत्साहित होते हुए मुझे रेडियो दिखाया हर कमरे में अब बल्ब लगें है और इस गर्मी में पंखा भी लग जाएगा उसके बाऊजी ने वादा किया है। मुझे इसमें इतना उत्साहित होने की वजह समझ नहीं आई हमारे घर में तो अभी टेलीविज़न भी आ गया है। रेडियो तो हम जन्म से ही देख रहे है। इसमें इतना खुश होने की क्या बात है। फिर पता चला कि इनके गाँव में दो तीन महीने पहले ही बिजली आई थी जिसके चलते सब लोग बहुत उत्साहित थे। पूरे घर में चारपाईयाँ और सरकंडे के मोढ़े और रस्सी से बुनी पीढ़ी के अलावा और कोई फर्नीचर नहीं था । औरते शाल और आदमी लोग कंबल ओढ़े रहते थे । कुछ सर्दी का मौसम और कुछ पानी का असर खाया पिया तुरंत पच जाता था और बार बार भूख लग जाती थी । अगले दिन सबने मेले में जाना था इसलिए लड़किया तो शाम होने से पहले ही अपनी तैयारी में लग गई और लड़के तो पतंग उड़ाने में व्यस्त थे। लड़कियों ने मिलजुल कर बारीक गोटा लगे सफेद मलमल के दुपट्टों को कच्चे पीले रंग में रंग लिया अपने सूटो के साथ मैचिंग स्वैटर व शाले॔ सभी कुछ तैयार कर लिया गया। वह घर पिंड के कुछ गिने चुने घरों में था जिसके पिछवाड़े में स्नानागार तथा शौचालय की व्यवस्था थी ।

अगले दिन सब सुबह उठकर हैंडपंप के गुनगुने पानी से स्नान कर तैयार हो गए और पराँठे मक्खन और और दूध के बड़े बड़े गिलास जिनको पंजाबी में पेंदी वाले गिलास कहा जाता है। अच्छी तरह से सब खा पी कर मेले की ओर निकल पड़े थे ।
रास्ते में पिंड के और कोई इक्का दुक्का छोटे बड़े समूह उस धूल भरी पगडंडी पर नज़र आ जाते थे जिनको वह हमारा परिचय देते ‘साढे दिल्ली दे परौणें’ यानि हमारे दिल्ली के मेहमान। वाहन सुविधा के नाम पर कुछ खास ना था दूर से धूल उड़ाता एकाध टांगा या फिर चिर्र चिर्राती चलती साइकिल रिक्शा या कोई एकाध नवविवाहित जोड़ा मस्ती में साइकिल पर सर्र से निकल गया । आसपास सरसों के खेत जिन पर लहलहाती पीली सरसों जैसे पीले रंग का गलीचा बिछा हो या फिर हरे हरे गेंहूँ के खेत जिनकी नर्म नर्म नन्हीं बालें उगनी शुरू हो चुकी थी जिनका ज्ञान मुझे रंजीता ने करवाया। मैं तो यह सब पहली बार देख रही थी । वहाँ पक्षियों का कलरव भँवरों की गुंजन कोयल की सुरीली कूक यह सभी था आज सोचने से सब याद आता है परन्तु उन दिनों अल्हड़पन में कुदरती संगीत का आनंद नहीं मालूम था ।

खेतों के बीचों बीच गुजरती धूल भरी कच्ची पगडंडी पर चलते हुए खेत के किनारे पर एक ऊंचा सा चबूतरा जिसके चारों तरफ तीन तीन चाप बने थे ऐसी मेहराबदार छतरी को बारादरी कहते है । यह मुझे रंजीता ने बताया तब पता चला कि आते जाते राहगीरों के सुस्ताने के लिए इसी तरह कहीं कोई भला करने के इरादे से ऐसा मेहराबदार चबूतरा बना देते थे जिसको बारादरी कहते थे । वहाँ कुछ देर बैठ कर कुछ हल्का चना मूँगफली खाया और आगे चल पड़े वही पास रहट से बंधे बैल घूम रहे थे । बैलों के घूमने पर उनके गले बंधी घंटियों का संगीत और रहट में लगी बाल्टियों का नीचे पानी भरना और ऊपर लाकर उडेलना एक अलग सा संगीत बजा रहा था। वहां से जाने को मन ही न चाहता था। सतलुज नदी भी दिखाई दी दूर से रंजीता ने बताया कि नदी के दूसरी तरफ पाकिस्तान है। कुछ देर और चले तो कुछ लोग दिखाई देने लगे पक्की सड़क आ गई जिसके दोनों तरफ दूर तक फैले खेत ही खेत दिखाई देते थे और उस पर फूली पीली पीली सरसों ऐसा लगता था जैसे पूरी धरती पीले रंग की हो । प्रकृति ने मुझे सदा आकर्षित किया है शायद इसीलिए वह दृश्य मेरे भीतर आज भी तरो-ताजा है।
वहीं सड़क के किनारे मैदान में मेला लगा था आसपास के और भी कई छोटे छोटे पिंडों के लोग थे क्योंकि मेले में खासी भीड़ लग रही थी । रंग बिरंगे कपड़े पहने औरतों और बच्चों की खूब भीड़ थी। लंबे चौड़े सिर पर पगड़ी बांधे हाथ में लठ्ठ लिए जाट किसान अपने परिवारों के साथ घूम रहे थे अधिकतर स्त्रियों ने पीला दुपट्टा और पुरुषों ने पीली पगड़ी पहन रखी थी ।
मेले मैं खूब रौनक थी हाट बाजार में सभी कुछ बिक रहा था आम जरूरत का हर सामान और खरीदारों की तो भरमार थी । कहीं ढोली ढोल बजा रहे थे लोग भागँड़ा कर रहे थे । पंजाबी में बोलियाँ डाल कर लड़कियाँ गिद्धा कर रही थी। खाने पीने के खूब खोमचे वाले खड़े थे तरह तरह की खाने की चीजे बिक रही थी ।रंजीता ने मुझे एक बात बताई कि उनके गांव में केवल दो ही हलवाई की दुकान थी जहाँ पूरी छोले,समोसे, जलेबी और शाम के समय पकौड़े बनते थे और दूसरे कं पास दूध दही मावा या कभी कभार बर्फी मिलती थी । बाकी मिठाइयाँ तो तीज त्यौहार पर ही मिलती थी । इसलिए जब कोई मेला लगता तो लोग खूब खाते पीते थे ।कुछ लोग मेले में कई तरह के खेल करतब भी दिखा रहे थे । मेले का सबसे बड़ा आकर्षण था बाइस्कोप जिसको देखने के लिए लम्बी लाइन थी। हमने भी लाइन में लग कर बाइस्कोप देखा तो हंसी सी आ गई कहाँ दिल्ली के वातानुकूलित पिक्चर हॉल का और कहाँ ये डिब्बा । उस समय कहाँ ऐसा सोच सकते थे कि कोई समय आएगा कि बाइस्कोप का भोंपू हाई फाई घरों के ड्राइंग रूम की शान होगा।
सारा दिन मेले में घूमने के बाद शाम होने से पहले ही घर का रूख कर लिया क्योंकि समय से घर भी पहुंचना था । रंजीता ने बताया कि अभी तो मेला एक महीने तक चलेगा और वह लोग दो तीन बार और आएंगे । रंजीता को भी इच्छा थी कि वह भी दिल्ली जाए बड़ा शहर देखने की और शहरी जीवन जीने की उसकी दिली तमन्ना थी । जब वे बात बात में कहती कि……………

“ हाँ तुस्सी ते दिल्ली जेहे बड्डे शहर विच रहेंदे हो आपां तां छोटे जेहे पिंड विच रहेंदे हाँ। कहते कहते उसका मुँह थोड़ा छोटा हो जाता एक हीन भाव सा आ जाता और मैं मन ही मन फूलने लगती और उसे गर्व से मुस्कुरा कर कहती तुम दिल्ली आना ना हम तुमको खूब घुमाएंगें । तब उसकी सादगी मुझे फूहड़ता लगती और उसकी अनभिज्ञता उसका भोलापन उसकी अज्ञानता लगती और खुद को मैं खूब हाई फाई और आधुनिक समझती ।
हम लोग दो दिन बाद दिल्ली वापस आ गये परन्तु मुझे वह गांव वह पगडण्डी वह बारादरी वह खेत और रहट
कभी नहीं भूले। सबसे यादगार वह मेहमान नवाज़ी जो पंजाबियों की खासियत है। भले ही साग रोटी खिलाएं परन्तु इतना अपनाप होता है कि भूख न होने पर भी इनसान खाने को ललचा जाता है। जब से बसंत और पतझड का अंतर समझ आया तो यह भी समझ आया कि सुविधासम्पन्न होना सुखी होना नहीं है जहाँ आत्मीयता होती है अपनापन होता है वहाँ मन में तसल्ली होती है और वही सुख है ।
अनीता सोनी

3 Comments

  1. Swaran Bhatia's avatar Swaran Bhatia says:

    Atti sunder man Kush ho gaya GBU 💐💐

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  2. डॉ.मंजु रुस्तगी's avatar डॉ.मंजु रुस्तगी says:

    बहुत सुंदर ढंग से ग्राम्य परिवेश के वर्णन किया है और वह भी वसंत के महीने में… लिखने की शैली ऐसी थी कि हम भी आपके साथ पंजाब की सैर कर आए

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  3. Dr. Anuradha Agarwal's avatar Dr. Anuradha Agarwal says:

    Excellent write up. Keep it up. But too long.

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