अपने अंतिम समय की तरफ खिसकता वर्ष क्या सोच रहा है। बतिया रहा है खुद से अपना विशलेषण कर रहा है। समय की सीमाओं बंधा समय कुछ कह रहा है।
चलते है अब यार ! कहने लगा ये साल।
समय की गिनती में आता हूँ , समय जो करे वही दिखाता हूँ।
आया था मेरा समय भी कभी , मैने भी कई ख्वाब सजाए थे।
खुशियाँ बिखेरूँ बहारें लाऊं ख्वाबों की ताबीर करूँ हर मानस को खुश कर जाऊं।
मेरा स्वागत भी बड़ी धाम से हुआ था ।
कोई झूमा था, किसी ने गाया था, कुछ छोड़ रहे थे पटाखे किसी ने गुब्बारों को उड़ाया था ।
कोई नहाया था शराब में कोई भक्ति में सराबोर था , बस मेरे जन्म का चर्चा ही हर ओर था ।
हर कोई आने वाले साल से नयी उम्मीदें जगा रहा था।
साल का पहला क्षण खुशियों भरा हो खुद में यही उमंग जगा रहा था ।
नव वर्ष मंगलमय हो ,हैप्पी न्यू ईयर कहते कहते सब थकते न थे ।
सुन सुन कर मुझको भी खुद पर गुमान आ रहा था।
मैं सभी की आशाओं को रोशनी दिखा रहा था।
सब की उम्मीदों को पूरा करने का विश्वास खुद में जगा रहे था ।
पर नहीं कर पाया ! मेरी क्या बिसात समय से निकला हुआ एक कतरा मात्र!
बारह महीने सावन हफ्ते या फिर तीन सौ पैसठ॔ दिन
बस इतना ही था मेरा जीवन।
इतने से जीवन में सब को सब कुछ कैसे दे पाता।
जैसे मनुष्य हर इच्छा को पूरा नहीं कर पाता ।
मैं भी समय की सीमाओं में बंधा एक कतरा हूँ मात्र ।
शैशवावस्था से परिपक्वता तक और अनंत की गर्त में समाने तक लगातार हूँ यही क़यास ।
सफल हो सदा सबके प्रयास ।
दिये उम्मीद के जलाए रखना और करते रहना प्रयास।
अच्छा तो अब में जाता हूँ तारीख बदल कर वापस आता हूँ।
अनीता सोनी चेन्नई स्वरचित मौलिक रचना

Beautiful. Aapko nav varsh ki bahut bahut shubhkaamnaye.
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