पोंगलो- पोंगल

             

सोसाइटी में  खासी रौनक है। सोसाइटी का कंपाउंड सुंदर सुंदर कोलम यानि  रंगोलियों से सजा हुआ  है। खूब चहल-पहल है। 

पोंगल के अवसर पर यहाँ कोलम डालने की प्रतियोगिता चल रही है। आज तड़के

ही स्नान से निवृत होकर नये नये कपड़ो में  लोग सजे धजे नज़र आ रहे है। स्त्रियों को देखे तो पट्टू सिल्क की साड़ी पहने माथे पर बिन्दी बालों में  ताजे मल्ली फूलों की वेणी महक रही है। खूब गहने पहने राजसी स्त्रियाँ लग रही है।  पुरुष भी परंपरागत वेशभूषा में  नजर आ रहे है। छोटे से ज़री  बार्डर वाली सफेद सिल्क या सूती वेस्टी के ऊपर चकाचक चमकती कलफ  लगी हुई कमीज कंधे के ऊपर अंग वस्त्र रखे हुए  है, माथे पर वैष्णवों का सीधा तथा शैवों का आड़ा त्रिपुंड भी सोह रहा है। अधिकतर छोटी लड़किया पट्टू पावड़े में  खेलती दिखाई दे रही है ।  पुराने समय में  तो गोबर से लीप पोत कर घर को नया किया जाता था पर अब वैसी बात नहीं फिर भी परंपरा को निभाने में  कोई कसर नहीं  छोड़ी  गयी है।

नये धान की फसल जो आई है।और कृषकों की धरती पर नयी फसल आना ही त्यौहार है। जहाँ  पोंगल  पकाने की तैयारी है, उस जगह को गोबर से लीपा गया है। तीन गन्ने एक दूजे संग टिका कर झोपड़ी का आकार दे दिया गया है और नीचे मिट्टी के चूल्हे पर रंग बिरंगी  मिट्टी की नयी हाड़ियाँ चढ़ी है फूल हार बांध कर किसी दुल्हन सी लग रही है । सूर्य नारायण की मंत्रोच्चार से पूजा शुरू  कर दी गयी। 

वाह! क्या दृश्य है अपनी लाली छिटकाते हुए  सूर्य भगवान के दर्शन  और एक लय में  मंत्रोच्चाण की ध्वनि,  हाथ जोड़  कर खड़े लोग! सकारात्मक ऊर्जा का वितरण सहज ही हो रहा है। मीठे और नमकीन पोंगल के लिए  दो  चूल्हों पर हाड़ियाँ चढ़ा कर तैयार रखी गई  है । अपने घरों से लाया हुआ मुट्ठी भर दाल चावल हर परिवार हांडियों में डाल रहा है। चूल्हों के भीतर सुलगते उपलों की आंच को  लकड़ियाँ धीरे धीरे पकड़ती जा रही है।

चूल्हों की कुछ  तेज होती आंच से हांड़ी में  उफान उठ रहा है नये धान की धवल झाग का उफान  अपने वेग से हांडी के ढक्कन को सरकाता हुआ बाहर निकल रहा है जिसके स्वागत में  पोंगला-पोंगल  के साथ करतल ध्वनि से पूरी सोसाइटी  गूंज उठी है। मालूम  नहीं ये क्यों किया जाता है ? शायद यही अन्न भगवान का  पूजन और सत्कार करने की विधि है।  नयी फसल की अन्न जल मिश्रित आहुति  अग्नि देव को स्वंय ही समर्पित हो रही है। 

माहौल ऐसा बना कि  कुछ औरते  पुराने तमिल लोकगीत गाने लगी है।

उधर सूर्य देव की लालिमा पिलिमा में  परिवर्तित  गयी है और मीठा व नमकीन  पोंगल दोनों बनकर तैयार हो चुके है। सोसाइटी के हॉल में नाश्ते के संग प्रसाद स्वरूप सबको वितरित किया जा रहा है। सुबह सुबह ।गरमागरम इडली वड़ा पोंगल सांभर व नारियल की चटनी के साथ  साउथ इंडियन कॉफी स्टील के कटोरी और ग्लास में  पीने का आनंद  ही कुछ ओर है। 

तमिलनाडु  में  पोंगल का त्यौहार तीन दिन तक मनाया जाता है। कल  सुबह गाय व बैल की पूजा की जाएगी फिर  रंगा रंग कार्य क्रम करने के लिए बाहर से कुछ लोगों को बुलाया गया है।  पोंगल के दूसरे दिन को माटु पोंगल कहा जाता है। और तीसरे दिन कान्नु  पोंगल  यानि घूमने फिरने पिकनिक  मनाने का दिन ।

उतर भारत में  भी इसी दिन मकर संक्रांति मनाई जा रही है। वहां  भी इसमें  मुख्य  तौर पर खिचड़ी ही होती है। खिचड़ी दान करना खिचड़ी  खाना खिलाना और पतंग उड़ाना।  यही  अनेकता में  एकता तो अपने देश की खासियत है । वैसे भी अपने देश में  खिचड़ी का महत्व बहुत है। ठाकुर जी के अन्नकूट में भले ही एक से एक भोग हो पर बिना खिचड़ी के छप्पन भोग भी पूरे नहीं माने जाते। तबीयत खराब हो तो खिचड़ी कुछ हल्का सुपाच्य खाने को मन करे तो खिचड़ी और घी से तर बतर खिचड़ी का स्वाद नींबू के आचार के साथ लाजवाब है।अपने देश की इस  महान सांस्कृतिक परंपरा के आगे नतमस्तक हो जाती हूँ। 

 वंदेमातरम भारत माता की जय 

               मकर संक्रांति 

     मकर संक्रांति का आया त्यौहार ।

         उतरमुखी हुए रविराय। 

       उतरायण का पर्व मनाए। 

  माघ महीना गंगा जमुना संगम स्नान।

    खिचड़ी तिल गुड़  करते दान ।

  औरो को खिलाए  खुद भी खाए।

        पड़े न पाले से रंग पीला।

    खाओ मूंगफली तिल गुड़ ढेला।

      खिली धूप और अंबर नीला।

    लगा आकाश में  पतंग का मेला ।

         रंग बिरंगी पतंगे उड़ती 

     ज्यों तितलियाँ बागो में फिरती।

         माझा डोर चरखी पतंग। 

         हर मन में  है भरी उमंग ।

       सब से ऊँची हम ही उड़ाए ।

        दूर गगन के पार ले जाएं। 

         हरी बैंगनी पीली लाल ।

         नीली ऊपर चढ़ती जाए ।

            नारंगी पीछे से आए ।

           काली ने कैंची चलाई 

         हरी बैंगनी काट गिराई।

         नारंगी आगे  बढ़ आई।

       नीली को है मात दिलाई।

        पीली हुई दोनों से तेज ।

      वाह तीनों में  लड़ गये पेच ।

     हर छत से बस शोर है आता 

    अरे इसे बचा अरे उधर बढ़ा ।

      अब दे दे तुनका काट गिरा ।

     कटी पतंग तो मच गया शोर ।

         बो काटे बो काटे बोल।

    आ उधर से पकड़ इधर को दौड़।

कटी पतंग  को लूटने, भागे इस-उस ओर

  किसके हाथ में आएगी पतंग की डोर । 

रंग बिरंगी पतंगो से फिर भी भरा आकाश।

  मकर संक्रांति का त्यौहार देता है संदेश।

जीवन में  हर्षोल्लास का हो सदा समावेश।

भले कुहासा बढ़ता जाए उतरायण तो आना है।

आशाओं की पतंग उड़ा कर खुशियों का दीप जलाना है।

अनीता सोनी चेन्नई 

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