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मई का महीना चल रहा है। गर्मी ने हाय तौबा मचा रखी है। शाम होने को
है धूप का सम्राज्य अपने उतार पर है। नमी से भरी समुद्री हवा का भारीपन
महसूस हो रहा है। इस समय सोसाइटी में भी वॉक करने वालों की संख्या में
बढ़ोतरी हो रही है। चाची भी वॉर्किंग ड्रैस पहने कुछ सखियों के साथ मुस्तैदी से
पार्क में वॉकिंग कर रही है। सोसाइटी के अधिकांश बच्चे छुट्टियों में बाहर घूमने
गये है कुछ बच्चे छुट्टी मनाने चेन्नई में आएं हुए है।
वॉक करते हुए सामने से सरला जी आती दिखाई दी ,” कहाँ जा रही है सरला जी”
दूर से ही आवाज लगाते हुए चाची ने पूछा…. और तेज रफ्तार से चलते हुए
सरला जी के पास पहुँच गयी, “क्या बात है सरला जी कहाँ है? दिखाई ही नही
देती न कंपाउंड में न योगा क्लॉस में… सब कुशल मंगल…”! पसीने से तरबतर
कपड़ो में…. हाथ के तौलिए से मुहँ पोंछते हुए चाची ने पूछा।
“ सब ठीक है प्रभु कृपा बस आजकल घर में खूब रौनक लग रही है….बिटिया
के दोनों बच्चे आए हुए है और बहु अपने काम से टूर पर है बस चारों बच्चों के
संग कुछ ओर करने का समय ही नहीं मिल पाता इन्हीं के पीछे लगे रहना पड़ता
है…।“ (रूमाल से अपने मुंह को पोछते हुए) “ ऊपर से तो इस मुई गर्मी ने हालत
बिगाड़ कर रख दी है….पा पा बहुत गर्मी है।“ सरला जी ने कहा ।
“ भई वाह तो आजकल नाती पोतो की सेवा हो रही है।“ कहते हुए चाची मुसकुराई
“क्या कहूँ सेवा क्या करनी है…. आपको तो पता ही है घर में हर काम के लिए
मेड तो है ही पर इन बच्चों को संभालना ही एक बड़ा काम है सारा दिन कंप्यूटर
छोडा तो आई पैड या टेबलेट पकड़ लेंगे इन चीजो को छुपा दो तो फोन पर लगे
रहेंगे कुछ न हुआ तो टीवी…. एक मिनट के लिए एसी बंद नहीं रहता…खाना पीना
तो आपको मालूम है सारा जंक फूड ही खा कर राजी होते है बच्चे। बाहर आए तो
गर्मी का राग मैं तो षस इसी से थक जाती हूँ….सरला जी कहे जा रहीं थी ।
तभी हाथ में अपने कुछ खाने के पैकेट पकड़े सरला जी के पोता पोती और नाती
नातिन “चलो…चलो नानी चलो…चलो दादी का शोर मचाते हुए वही पर आ गये
कुछ आठ से बारह वर्ष की उम्र के बच्चे है। बस यूँ ही आजकल के बच्चों पर
चर्चा शुरू सी हो गयी सब लोग वॉकिंग खत्म कर चबूतरे पर आकर बैठ गये।
इसी बात पर हर कोई अपने अनुभव और सुझाव देने लगा। सरला जी ने बच्चों
को वहीं पार्क में बैठ कर अपना बर्गर खाने के लिए कहा चलो यही कुछ देर रहते
है बच्चों देखो कितनी अच्छी और ठंडी हवा चल रही है।
“ कहां नानी…. सब पिच पिच हो रहा है यहाँ अच्छा नहीं है अपन एसी में बैठते है”।
चाची को शायद टॉपिक मिल गया और किसी तरह बच्चों को अपने पास बिठा ही
लिया चाची को बच्चों से बात करते देख सोसाइटी के कुछ बच्चे जो पार्क में खेल रहे
थे दौड़ कर आ गये और चाची को सुनने लगे। “तुमको पता है यह हवा इतनी पिच
पिच वाली क्यों है…. ओर जानते हो प्रकृति के हर मौसम के फायदे होते है और यह
इसीलिए बने है कि सृष्टि का चक्कर सही से चल सके। हरेक मौसम का हमारे
जीवन पर प्रभाव पड़ता है। हम भारत में रहते है और भारत में सभी छः ऋतुएं
आती है। आज हम ग्रीष्म ऋतु के बारे में समझते है। तुम्हारे स्कूल में वॉटर
साइकिल के बारे में तो पढ़ा ही होगा”। चाची के इतना कहने पर कई बच्चे
हाँ में जवाब देने लगे कुछ के पास फोन था तो गूगल कर देखने लगे। अरे
बेटा गूगल मत करो देखो ग्रीष्म ऋतु में सूरज बहुत तपता है तो इस मौसम में
धरती का पानी समुद नदी तालाब इत्यादि से गर्म होकर भाप के रूप में ऊपर
उठने लगता है और बहुत ऊपर पहुँच ठंडे वातावरण में भाप छोटे छोटे बर्फ के कणों में
जमने लगती और जब यह जमे हुए भाप के कण इकट्ठे होकर बादल का रूप
ले लेते है और उड़ते उड़ते जब नीचे की तरफ आते है फिर से सूरज की तपन से
पिघलने लगते है और फिर से पानी के रूप में धरती पर बरसते है प्रकृति अपने
ही ढंग से धरती से उठाया हुआ गंदा पानी भी स्वच्छ करके बरसा देती है ।
सब बच्चे इतनी आसानी से बात समझ कर ताली बजाने लगे। तभी नमन अपना
फोन जेब में रखते हुए बोला “ no चाची जब तक आप इसकी हिन्दी में कविता
नही सुनाएंगे यह तो incomplete ही माना जाएगा। “ सभी बच्चे हाँ में हाँ
मिलाने लगे । अच्छा बाबा सुनाती हूँ प्यार से नमन को थपथपाते हुई चाची ने
कहा। तो बच्चों आज की कविता नाम है गर्मी का मौसम
गर्मी का मौसम~~~~~
हाय हाय गर्मी कितनी गर्मी ,अब के बरस तो बहुत है गर्मी।
झर झर तन से बहे पसीना , हरदम ठंडा ठंडा पीना।
हर बरस का यही फसाना , हर गर्मी का यही तराना ।
गर्मी की छुट्टिया जब आएं , बच्चे घर में ऊधम मचाए।
व्हाटसअप फेसबुक इंस्टाग्राम, पड़े सब यहीं सब तज के काम।
नकली प्रतिभा का ये रवैया , आदत में पक जाओ न भैया ।
आओ प्रकृति का नियम बताएं , कविता में विज्ञान को गाएं ।
गर्मी का जब मौसम आता , तपता सूरज आग बरसात ।
सागर सरिता का जल तप कर , वाष्प बन उड़ जाता ऊपर ।
वाष्पीभूत जब होता पानी , तैयार हो रही बरखा रानी ।
धरती पर है मची दुहाई ,गर्मी ने आफत खूब मचाई ।
सूख रहें है खेत खलिहान, पीत हुए वृक्षों के पात ।
आग बरसाते जेठ आषाढ़ , कैसे सहे गर्मी की मार ।
तरल तरल थे ताल तलैया , वाष्प हुआ जल बना सुरैया ।
उड़ गया दूर गगन के ऊपर , ठंडा होकर बना वो हिमकण ।
छोटे हिमकण हुए एकत्रित, बड़े मेघों में हुए परिवर्तित ।
आषाढ़ की होने लगी विदाई , काली घटा अंबर पे छाई ।
सावन का संदेश लाई , सौंधी मिट्टी मन को भाई ।
ऊमड़ घुमड़ कर बादल आए, इक दूजे से जा टकराए।
गड़गड़ गड़गड़ बादल गरजे ,चमचम चमचम बिजली चमके ।
मेघ बरसते मूसलाधार , हरियाली का हुआ विस्तार ।
भर गये सूखे ताल तलैया , भर भर जल को बहती नदियाँ ।
देखा प्यारे बच्चों तुमने ,कैसे प्रकृति हमें पालती ।
जो कुछ भी यह लेती हमसे ,कई गुणाकर दे डालती।
आओ प्रकृति का करें सम्मान, पर्यावरण का रखें ध्यान ।
हर ऋतु करती अपना काम , यही सिखाता हमें विज्ञान। अनीता सोनी चेन्नई मौलिक बाल रचना ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
