अरे वाह भई आज तो सब खूब सज रही हो, सबके हरे हरे लिबास कुछ कह रहे है। कहाँ घूम कर आई हो ?
मुस्कुराते हुए चाची ने। पूछा…..
नमस्ते चाची आज हरियाली तीज का
फंक्शन था क्लब की महिला मंडल ने अरेंज किया था E.C.R के बीच हाऊस में…. खूब मजा आया ….!
लीना ने उबासी लेते हुए कहा ।
मजा तो आना ही था 1500 ₹ एंटरस के चुकाने पडे खाना पीना गाना बजाना तंबोला as usual वही सब तो था ….अच्छा बाए चाची फिर मिलते है, बहुत थक गए है….. जमीन को बुहारती हुई अपनी ड्रेस को समेटने की कोशिश करते हुए ऊँची एड़ी की चप्पल
को टक टक बजाते हुए प्रीती भी आगे हो गयी ।
चाची वहीं लॉन में अपनी कुछ हम उम्र सहेलियों के साथ शाम की सैर कर रही थी। वे आपस में अपने जमाने की हरियाली तीज को याद कर रही थीं, और आज के जमाने से तुलनात्मक चर्चा चल रही थी। बात करते हुए बरसों पुरानी हरियाली तीज की याद ताजा हो गईं। कहते हुए चाची तो जैसे खो ही गई।
उन दिनों दिल्ली के पुराने दरियागंज में हम रहा करते थे। दरियागंज की मुख्य सुड़क ऑसफअली रोड जो दिल्ली गेट से लालकिले की तरफ जाती है उसी सड़क के आगे जाकर एक पुल बना है पैदल सड़क पार करने वालों के लिए तकरीबन वहीं पर एक चौंक पड़ता है जहां से बायीं मछली बाजार और आगे जामा मस्जिद है और इसी चोंच के दायीं तरफ यह जनाना बाग था, या है भी जिसका नाम पर्दा बाग है। लालकिले के लाहौरी गेट के साथ जहाँ पर लाल किला खत्म होता है कमोबेश उसके साथ ही यह बाग था । बाग के साथ ही एक छोटी सी रिफ्यूजी कॉलोनी थी जहाँ हमारे संग पढ़ने वाली बहुत सी लड़किया रहती थी। हालांकि हमारे दादा पिता भी पाकिस्तान से ही आए थे पर अब तक अपने घरों में व्यस्थापित हो चुके थे। हम लोग न्यू दरियागंज के स्कूलों में पढ़ा करते थे, अच्छे और ज्यादातर स्कूल वहीं थे। लड़के कहाँ घूमते थे नहीं मालूम पर अधिकांश लड़कियों के घूमने की जगह तो पर्दा बाग ही हुआ करती थी । स्कूलों की छुट्टी के बाद या इम्तिहान के दिनों में तो हर स्कूल की लड़किया पर्दा बाग में मौसी की चाट खाती नज़र आती थी। पर्दा बाग के नाम से माँ बाप भी जाने की इजाजत आसानी से दे देते थे। वाकई पर्दा बाग लड़कियों के लिए एक सुरक्षित जगह थी। इतिहास में तो नही पढ़ा पर सुनते थे कि मुगलों द्वारा यह जनाना बाग बनवाया गया था।
वहां केवल पांच साल तक के लड़के अपनी माँ या बहन के साथ जा सकते थे। घने व विशाल वृक्ष थे इस उद्यान में खूब छायादार बड़ा सा लॉन था । काफी मेंटन करके रखा था, रख रखाव तो दिल्ली नगर निगम ही किया करता था।
यूँ तो हरियाली तीज हर साल ही आती पर उस वर्ष कुछ खास था। ताई जी की लड़की शादी के बाद पहला सावन करने मायके जो आई थी । यूँ तो उसके बाद भी कई हरियाली तीज देखी थी पर अपने होशोहवास में यह पहली बार था ।
जहाँ तक मुझे याद है कि नवविवाहिता दीदी को सावन के महीने मे घर लिवा लाए थे हरियाली अमावस्या के आते आते तीज मनाने की भरपूर तैयारी शुरू हो गई थी । मठरी, गोजे, कचौरी आदि सूखे नमकीन और मिष्ठान्न बनाए जाने लगे थे। बुआ मौसी मामी कुछ आस पड़ौस व दीदी के ससुराल वाले सभी को न्यौता जा चुका था। माँ ताई चाची सभी मिलजुल कर तीज के कुछ दिन पहले से इसी तैयारी में लगी थी । मुख्य फंक्शन तो घर में होना था पर पर्दा बाग जाए बिना तीज का त्यौहार संपन्न न हो पाता । बस इसी की प्लानिंग चल रही थी कि कब क्या किया जाए।
भरा पूरा संयुक्त परिवार था तीन बहुओ के दर्जन भर से अधिक बच्चे मिसरानी और दो नौकर घर में हर समय ही गहमा गहमी रहती थी ऊपर से कोई तीज त्यौहार आ जाए तो घर भर में शादी का सा माहौल हो जाता था।
इस बार तो पर्दा बाग में भी जाना था। वहां तीज का मेला लगता था। खास तौर पर दरियागंज और चांदनी चौंक की औरतों और लड़कियों की भीड़ हुआ करती थी ।
सुबह जल्दी पहुँच कर किसी विशाल घने पेड़ के नीचे जगह पकड़ना जहाँ पर बैठने के लिए बड़ी चादर या दरी बिछाई जा सके और किसी पेड़ की मजबूत डाली को ढूंढना जिस पर अपना झूला डाला जा सके इस काम के लिए मिसरानी को पहले से ही तैयार किया जा चुका था , क्योंकि बाग में लोहे की मजबूत सांकल से बनी पींगो पर झूलने के लिए तो लाइन लगाने के साथ लड़ाई झगड़े में भी महारत हासिल होनी जरूरी थी। और फिर कलात्मक पहलू भी सिद्ध होता था ।
‘सखी अंबुआ की डाली पे झूला झूलत है , आई बरखा बहार ‘ जैसी कई कविताएं अपने को सार्थक कर लेती थी ।
कल तीज थी और तैयारी अपने चरम पर थी हो भी क्यों न घर की सबसे बड़ी लाडली का शादी के बाद पीहर में पहला सावन था । दिन भर तो औरतों की मौज मस्ती थी और रात्रि भोज में पुरुषों को भी बुलाया गया था सो वह तैयारी भी करनी थी ।
सुबह सवेरे घर की बैठक तथा बैठक के बाहर वाले दलान को झाड़ बुहार कर साफ कर लिया गया । बच्चों का बैठक में जाना वर्जित ही था पर घर की स्त्रियां भी कम ही जाती थी क्योंकि दादा जी का कमरा भी यही था और बैठक का दीवान ही उनका पलंग था,
और मेहमानो केलिए भी यही कमरा था। दिवान सोफे और कुर्सियों पर हाथ की कढ़ाई किए हुए सफेद कवर चढ़ा दिए गये बदरंग सी मेज भी आज तो चकाचक सफेद मेजपोश से ढक दी गई
उस पर कढ़ाई किए गये बेल बूटे बहुत सुन्दर लग रहे थे। आँगन के ऊपर बिछे
लोहे की सींखो के जाल से रस्सियाँ डाल कर झूला भी डाल लिया गया ।
सुबह ग्यारह बजे से ही मेहमानों का आना शुरू हो गया। कुछ ही देर में घर खचाखच भर सा गया बुआ मौसियां मामियां सभी अपनी बहु बेटियों के साथ पड़ौस की स्त्रियां दीदी की सहेलिया घर में औरतो का जमघट सा लग गया। सावन की बदरी भी आसमान पर छा गई। जीजाजी भी अपनी माँ और भाभी को लेकर आ गये।
दीदी भी बड़ी सुंदर लग रही थी हरे रंग की महीन सी साड़ी जिस पर गुलाबी रंग की छोटी बूटी कढ़ी थी गले में हरे मीने के काम वाला पतला सा नेकलेस पहने बैठी थी बारी बारी से सब औरतों ने फूलों के गहने पहनाकर उनका श्रृंगार किया लगातार लोक गीतों की आवाज़ घर में गूंज रही थी एक बंद होती तो दूसरी शुरु हो जाती। लता दीदी बड़ी दीदी के हाथीं में मेह॔दी के बेल बूटे रचा रहीं थी। वही माचिस की तीली के साथ एक दूसरे को भी आपस मेह॔दी लगाई जा रही थी। उन दिनों मोबाइल कहाँ होते थे।और इन छोटे छोटे फंक्शनों की फोटो लेना कोई जरूरी भी न था । फिर भी पड़ोस के बंटू भैया फोटो खींचने के शौकीन थे औरतों के जमघट में खड़े हुए कनखियों से हम उम्र लड़कियों को निहारते हुए दीदी के दो चार फोटो ले ही गये। कब रील पूरी होगी और धुलाई जाएगी और फोटो मिलेंगे कह नहीं सकते। पर मजा आ रहा था दीदी को सबसे खूब उपहार मिल रहे थे।पर्दा बाग जाने का इंतजार सबसे अधिक था। पर अभी तो सावन की सौगात खीर और मालपुआ खूब खाया जा रहा था
दोपहर के दो बजे तक खाना निपटा तो अब पर्दा बाग जाने की तैयारी शुरू हो गई। बंद गली का आखिरी मकान था हमारा घर, भीतर घूमते घूमते गली इतनी छोटी हो जाती कि अंदर तक साइकिल रिक्शा भी न आता। और पैदल चल कर ही घुमावदार गली पार करनी पड़ती। मैं तो निकलने के इशारे के इंतजार में थी कि शूट लगाकर पर्दा बाग पहुँच जाऊं और जाकर अपनी पींग पकड़ लूं, फिर आज तो चाट वाली कई मौसियाँ होंगी।
हालांकि घर में भी चूड़ी वाले को बुलाकर सबको चूड़ियां चढ़ाई जा रही थी पर परदा बाग में दुलारी मौसी ईजितने प्यार से चूड़ी चढ़ाती वैसे कौन पहनाता आज भी दुलारी मौसी का डॉयलाग याद है मिस्री घुली आवाज “अए बहुत दिनन में आई लाली दिखा नया डिजाईन खूब जमेगो म्हारी लाडो की कलाइन पे”। एक हाथ से कलाई पकड़ती और दूजे हाथ की दो अंगुलियों में दर्जन भर चूड़ियां लटकाती और बाकी तीन अंगुलियों से पल भर में सारी चूड़ियां कलाइ में पहना देती और
बच्ची की बिखरी लट सँवारते हुए कहती “ अए वाह खूब जंच रही हमारी लाली ।
साइकिल रिक्शाओं में बैठ कर आखिरकार सभी पर्दा बाग पहुँच ही गये।
मिस्रानी घने से पेड़ के नीचे दरी बिछाए जगह को पकड़े रखने के लिए कभी किसीसे तकरार तो किसी को प्यार से
समझाते हुए अघा रही थी, और उधर उसकी दोनों बेटियाँ पेड़ पर डाला हुआ झूला सम्भाले खेल रहीं थी।
बुआ और मामी एक ही स्वर में ताई जी से बोली “ अब तो मौसी की चाटो का लुत्फ लेना है भई मैं तो बहुत दिनों बाद आई हूँ “। “ हाँ…हाँ क्यों नही… ( ताई जी अपना बटुआ पकड़ाते हुए ) अब यही सब खाना… भुट्टे, पापड़, गोल गप्पे,अंकुरित मोठ की चाट, भूनी शकरकंदी की चाट और त्रिपता मौसी की फलों की चाट अमरक डलवा कर खाना मत भूलना ,जिसको जो खाना हो मजे से खाए,झूला झूले गीत भी गाते है। आज हमारी बिटिया की शादी के बाद पहली तीज है बस आप सब खुशियों भरा आशीर्वाद दें हमारी लाडो खेलती खाती अपना वैवाहिक जीवन गुजारे।
पर्दाबाग मे ऐसे कई झुण्ड थे बस गीत गाने की आवाजें आ रही थी। हर कोई अपने झुण्ड में मस्ती में डुबा था। किसी के यहाँ शादी की पहली तीज थी तो कोई परिवार के साथ कोई सहेलियों के समूह वैसे ही इकठ्ठे हो कर के आये थे । पेड़ों पर नये नये पत्ते आ रहे थे, गर्मी से मुरझाए बाग को बरखा ने नया जीवन प्रदान कर दिया था । सौंधी सी मिट्टी की महक ने हवा को ताजा कर दिया था । खाली अमराईया झूलों से भर गयी थी। वातावरण धुला सा लगता था। उन दिनों प्रदूषण शब्द आम बोलचाल को भाषा में नही था। अचानक से अंबर में काली बदली छा जाती और ऊमड़ती घुमड़ती घटाएं कभी तेज बौछार तो कभी बूंदा-बांदी करके खाली हो जाती और फिर चांदी से चमकते बादलों के मध्य से नीला अंबर झांकने लगता । कुछ गीले होते कुछ सूखते से तीज के मेले का आनंद लिया जा रहा था। लॉन के तीन तरफ लाल पत्थर का रास्ता बना था जिसके एक तरफ सभी चाट वाली मौसियाँ बैठती और आज त्यौहार के दिन और भी मौसियाँ थी। खूब भीड़ थी उनकी तरफ भूनते भुट्टे, राख की हल्की सी आंच पर सिकती शकरकंदी चाट के मसालों की सुगंध ने वातावरण को मजेदार चटपटा बना दिया था। पत्तों में भी चाट कर खाने का अपना ही मजा था । चूड़ी वाली मौसी के पास रंग बिरंगी खनऊ खनकती चूड़ियाँ तो देखते ही बनती थी।उन दिनों जीवन मे सहजता अधिक थी । जहां आज मशीनो के चलते भौतिक सुविधाओं की भरमार तो हो गई है पर उन्हीं सुविधाओं को जुटाते रहने से जीवन के क्रियाकलापों में थकान महसूस होने लगी है । रिश्तों मे भी सहजता शून्य हो गई है। केवल औपचारिकता रह गयीं है।
खुशगवार मौसम में मिल बैठ कर खाना पीना गाना बजाना हंसी ठिठोली झूला झूलना ऐसा आनंद है जिससे मन सहज हो जाता है। इसी तरह तीन चार घंटे कहाँ बीते समय का आभास ही न रहा। गर्मियों में शाम के छः बजे परदा बाग बंद हो जाता था, अब डंडा हाथ में लिए चौकीदार घूम घूम कर सबको जाने के लिए कहने लगे और लोग भी समेटने में लग गए। सावन में महीना भर पर्दा बाग इसी तरह रौनक बनी रहती थी। हम लोग भी यदा कदा इसका आनंद लेते ही रहते अधिकतर सहेलियों के संग कभीकभार परिवार के संग ।
चाची ने तो अपनी याद को तरोताजा किया और बाकी लोगो ने सुनते सुनते दरियागंज के पर्दा बाग की सैर कर ली।
अनीता सोनी चेन्नई
