चाची के चबूतरे पर सब बच्चों का जमघट लगा हुआ है । आएं जरा देखे क्या चल रहा है ।
अरे आज तो छोटे बड़े सभी बच्चें यहाँ तक कि कॉलेज जाने वाले बच्चें भी दिखाई दे रहे है।क्या कुछ खास चल रहा है ह? हमेशा की तरह चाची चबूतरे पर बैठी है और सभी चाची को घेरे हुए है।चाची कह रही हैं ,
” आज जानते है सब बच्चों को यहाँ क्यों बुलाया गया है। आज 26 दिसम्बर है। इस दिन को एक खास दिन घोषित किया गया है । ‘वीर बालक दिवस’ पिछले साल 2021 में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस दिवस की घोषणा की थी । बच्चों इस दिवस के पीछे 1704 ई• का एक इतिहास है जिसको कुछ खास नहीं पढ़ाया जाता…..” हाँ ….हाँ ….मैं जानता हूँ इसके बारे में ” उत्साह से भरा कॉलेज जाने वाला मनिंदर कुछ कहना चाहता था।
“हाँ …हाँ…कहो न मनिंदर “चाची ने कहा।
“इस दिन सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के साहेबजादों को औरंगजेब द्वारा शहीद किया गया था उनको श्रद्धांजलि देने के लिए गुरुद्वारे में पाठ कीर्तन व लंगर किया जाता है।….और सिख धर्म में यह बहुत बड़ा दिन माना जाता है।
“पर इतिहास में तो इसके बारे में कुछ खास नही पढ़ाया जाता…। ” चेतन ने कहा
” हाँ क्योकिं साहेबजादों की शहीदी का इतिहास धर्म विशेष से जुड़ा है शायद इस लिए नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है।” चेतन का दोस्त अमित बोल उठा ।
नेहा और मनमीत एक स्वर में बोल उठी… “पर ऐसा क्यों “? नेहा बात को पूरा करते हुए ….” पर हमारे देश में धर्म की बात करना बुरा क्यों समझा जाता है चाची”
“पर चाची साहेबजादों को शहीद क्यों होना पड़ा ….” नाक के ऊपर अपने चश्मे को ठीक करते हुए वंदना ने पूछा ।
“मैं समझती हूँ बच्चों में यह जिज्ञासा उठना स्वाभाविक है। लगभग बारहवीं सदी में भारत में मुसलमानों आक्रमण किया और हमारे देश में राज करने लगे तो जबरदस्ती वे भारतीयों को मुसलमान बनाने लगे उनके अत्याचार से डर कर कई लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन भी किया आगे चलकर मुगलों ने भी यही किया। जबकि हिन्दु धर्म की रक्षा की खातिर सिखों के नौवें गुरू श्री गुरु तेगबहादुर जी ने अपना शीश कटवा कर बलिदान भी दिया पर औरंगजेब के अत्याचार और बढ़ें तो सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने मुगलों के खिलाफ धर्म युद्ध छेड़ दिया।
जिस युद्ध में उनके दो बड़े पुत्र अजीत सिंह जी और जुझार सिंह जी युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और उनके छोटे दोनों पुत्र फतेह सिंह जी और जोरावरसिंह सिंह जी को दीवार में चिनवाया दिया गया। आज हम उन बहादुर वीरों की याद में ‘वीर बालक दिवस ‘ इस लिए मना रहे है हमारे देश के बच्चे इस जज़्बे को समझे तथा अपने राष्ट्र, धर्म व परिवार के प्रति सदा सजग वफादार व समर्पित रहें। “…….इससे पहले कि चाची कुछ और कहती कि छोटे बच्चे चार साहेबजादों की कविता सुनने की जिद करने लगे ।
“हाँ हाँ सुनो सुनो तो आज की कविता का शीर्षक है
26 दिसम्बर ‘वीर बालक दिवस’
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‘ वीर बालक दिवस’ 26 दिसम्बर
आओ बच्चों प्यारे बच्चों आज तुम्हें हम कुछ बतलाएं
भारत के इन वीर बालकों का तुमको इतिहास सुनाएं।
शीश दिया पर धर्म तजा न कुर्बानी की कथा सुनाएं ।
आक्रान्ताओं का था साम्राज्य अपने धर्म पर लगी थी घात ।
अत्याचार कर कुचला जाता जो करता धर्म की बात।
दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी धर्म युद्ध करते थे ।
पिता गुरू तेगबहादुर सिंह जी के पथ पर चलते थे।
चारों साहिबजादों को भी पाठ यही पढ़ाया था ।
खा झूठी कसम निज धर्म की मुगलों ने धोखा दिया ।
आनंद पुर साहिब का दुर्ग गुरु गोविंद सिंह ने छोड़ दिया ।
चाल चली दुशमन ने ऐसी परिवार एक दूजे से बिछड़ गया ।
मात्र 43 की फौज का मुगलों से युद्ध छिड़ गया ।
साहेबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह रण में हुए शहीद थे।
साहेबजादे फतेहसिंह और जोरावरसिंह सिंह भी बहुत निर्भीक थे।
माता गुजरी सहित दोनो को वजीर खाँ ने पकड़ लिया।
पौष मास की शीत रात्रि में ठ॔डे दुर्ग में बंद किया।
सिपहसलारों ने समझाया तुम इस्लाम कबूल करों।
कलमा पढ़ मोमिन बन जाओ और कष्टों को तुम दूर करों।
उत्तर दिया साहिबजादों ने यूँ धर्म न अपना खोते है।
दशमेश पिता के पुत्र है हम गुरु तेगबहादुर के पोते है।
वजीर खाँ ने आ धमकाया और प्रेम से भी फुसलाया।
जांबाजो के जज़्बे के आगे कुछ भी न था काम में आया।
गरजे वह सिंह की दहाड़ से,
गूंजे थे शब्द दिशाओं को फाड़ते।
तजे नहीं निज धर्म को हम चाहे कितने कष्ट सहे ।
भले शीश कलम हो जाए पर कलमा न हम पढ़े।
साहेबजादों की सुन प्रतिज्ञा वजीर खाँ था गुस्साया।
ज़िंदा दिवार में चिनवाने का जालिम ने फरमान सुनाया ।
नौ और पाँच वर्ष मात्र अवस्था बच्चों की थी।
पर्वत को जो नीचा करदे हिम्मत उन वीरों की बड़ी थी ।
जब दीवार में चुन रहे ज़ालिम जल्लाद थे।
वीर बालकों के मुख से निकल रहे यही उदगार थे ।
‘ बोले सो निहाल सत् श्री अकाल’
‘बोले सो निहाल सत् श्री अकाल’ !!!
कहते कहते यही दिवार में साहेबजादे बन्द हो गये ।
जालिमों जल्लादों के कानों आवाज यही अब गूंज रही थी।
करने को अपनी तस्सली दीवार को था
गिरा दिया ।
सिंह सपूत बेहोश पड़े देखा तो ज़ालिम घबराएँ।
क्रूरता की पराकाष्ठा बन वीरों पर बरपाए।
ले तलवार उसी क्षण में धड़ से शीश अलग किया।
पर इतिहास में सदा के लिए साहेबजादो को अमर किया।
घटना यह घटी 26 दिसम्बर सन् 1704 को।
शीश नवाते है हम वीरों वीरों के अवतार को।
26 दिसंबर को सदा ‘वीर बालक’ दिवस मनाते है।
अडिग रहें हम धर्म पर अपने जज़्बा यही जगाते है।
अनीता सोनी चेन्नई