हे कृष्ण! तुम क्या हो?

हे कृष्ण! तुम क्या हो ? आखिर क्यों सता जाते हो।

उठते हो सागर की लहर से, एक भाव में  खो जाते हो ।

पैदा होते हो कारागार में, गोकुल में खुशियों का बिगुल बजाते हो।

कितने राक्षसों का उद्धार कर कालिया के फन पर नृत्य करते हो ।

 रास रचाते हो, कभी एक चुटकी अंगराग  के बदले कुब्जा को सुन्दरी बना जाते हो।

कूंजों में बजाते हो कभी बाँसुरी,  युद्ध के मैदान में कभी गीता सुनाते हो।

बंध जाते हो कभी हाथ से यशोदा के, और कभी यूं ही कंस को मार गिराते हो।

गोपों के संग वन विहार करते हो कभी

अंगुलियों में फंसाए नींबू आचार को खिचड़ी संग चाट चाट के खाते हो ।

अपहरण करते जब ब्रह्मा सबका तो गाय बछड़े  गोप ,ग्वाले, फूल पत्ते,  श्रृंगी, कौड़ी, 

बाँसुरी, डंडे, हरा अंगोछा, काला कंबल, पीली धोतीऔर न जाने क्या क्या सब तुम ही बन जाते हो। 

कितने ही  द्वंदों को जीता है तुमने, छोड़ एक युद्ध अदना सा रणछोड़ कहलाते हो।

हे कृष्ण! आखिर क्या हो?

 अपनी नाम से मोह ले जाते हो।

गोपियों के कन्हैया ,बलराम के भैय्या ,

यशोदा के कान्हा, राधा के श्याम, गोपों के सखा , नंद के लाला माखनचोर,बनमाली, बनवारी ,बंसीवाला 

क्या क्या हो तुम ? केशव, माधव ,मधुसूदन 

मोहन, मदन, मुरारी कहलाते हो गिरिवर धारी ।

ध्यान धरा मीरा ने गिरिधर गोपाला,  आए श्याम सुन्दर विष अमृत  कर डाला।

किस नाम से पुकारूँ तुमको हे देवकी नंदन वसुदेव  के लाला ।

 कहे रसिया  कहे छलियाँ, घनश्याम मुरली वाला कहतीं है ब्रजबाला ।

परब्रह्म ,परमेश्वर, परमात्मा, विश्वात्मा  अच्युत,  अभेद्य, अगाध , आपार 

हे  कृष्ण ! तू कितने विशाल नाम वाला ।

मनमोहन चितचोर मनमीत हे गैया चराने वाला ।

छछिन भरी छाछ पर ब्रज बाला की 

नाचता है बनके नंद  लाला।

हे कृष्ण !  आखिर  तुम क्या हो ?

चुम्बक हो तुम ! सबको अपनी ओर खींच लेते हो।

काले होकर भी श्याम सुन्दर कहलाते हो।

हे घनश्याम,  घनश्याम बन बरसो अब ।

हे कृष्ण  तरसना इस ह्रदय का बंद होगा कब ।

एक बूँद तेरे दरस की भिगो जाएगी मन मेरा ।

एक बार हो जाऊं  श्याम ह्रदय से तेरा।

एक नज़र भर देखी मूरत तुम्हारी। 

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी ।

यही है तुमसे विनती हमारी।

न हो दूर  हमसे हे कृष्ण मुरारी ।

सदा साथ हो तुम ,सदा पास हो तुम।

अहसास हो यही सदा साथ हो तुम।

मूरत जिसने तेरी मन में  बसा ली ।

हे कृष्ण !  उसने यह दुनिया गवां ली।

हे कृष्ण ! मैंनें  जाना  तुम चुम्बक हो।

मन से देखे जो तुझको तेरा हो जाता है।

खो गया जो एकबार तुझ में फिर सब बेमायने हो जाता है।

अनीता सोनी चेन्नई 

स्वरचित मौलिक रचना  

हरियाली  तीज

अरे वाह भई आज तो सब खूब  सज रही हो, सबके हरे हरे लिबास कुछ कह रहे है। कहाँ घूम कर आई हो ? 

मुस्कुराते हुए  चाची ने। पूछा…..

नमस्ते  चाची आज हरियाली तीज का 

फंक्शन था  क्लब की महिला मंडल ने अरेंज किया था E.C.R के  बीच हाऊस में…. खूब मजा आया ….!

लीना ने उबासी लेते हुए  कहा ।

मजा तो आना ही था 1500 ₹  एंटरस के चुकाने पडे  खाना पीना गाना बजाना तंबोला as usual वही सब तो था ….अच्छा बाए चाची फिर मिलते है, बहुत  थक गए है….. जमीन को बुहारती हुई अपनी ड्रेस  को समेटने की कोशिश करते  हुए ऊँची एड़ी की चप्पल 

को टक टक बजाते हुए  प्रीती भी आगे हो गयी ।

चाची वहीं  लॉन में  अपनी कुछ हम उम्र सहेलियों के साथ शाम की सैर कर रही थी। वे आपस में अपने जमाने की हरियाली तीज को याद कर रही थीं, और आज के जमाने से तुलनात्मक चर्चा चल रही थी। बात करते हुए  बरसों  पुरानी हरियाली तीज की याद ताजा हो गईं। कहते हुए  चाची तो जैसे खो ही गई। 

उन दिनों दिल्ली  के पुराने दरियागंज में  हम रहा करते थे। दरियागंज की मुख्य सुड़क ऑसफअली रोड जो दिल्ली गेट से लालकिले की तरफ जाती है उसी सड़क के आगे जाकर एक पुल बना है पैदल सड़क पार करने वालों के लिए तकरीबन वहीं पर एक चौंक पड़ता है जहां से बायीं मछली बाजार और आगे जामा मस्जिद है और इसी चोंच के दायीं तरफ  यह जनाना बाग था, या है भी जिसका नाम पर्दा बाग है। लालकिले के लाहौरी गेट के साथ जहाँ  पर लाल किला खत्म होता है कमोबेश  उसके साथ ही यह बाग था । बाग के साथ ही एक छोटी सी रिफ्यूजी कॉलोनी थी जहाँ हमारे संग पढ़ने वाली बहुत सी लड़किया रहती थी। हालांकि हमारे दादा पिता भी पाकिस्तान से ही आए थे पर अब तक अपने घरों में  व्यस्थापित हो चुके थे। हम लोग न्यू दरियागंज के स्कूलों  में  पढ़ा करते थे, अच्छे और ज्यादातर  स्कूल वहीं थे। लड़के कहाँ  घूमते थे नहीं मालूम पर अधिकांश लड़कियों के घूमने की जगह तो पर्दा बाग ही हुआ करती थी । स्कूलों  की छुट्टी  के बाद या इम्तिहान के दिनों में  तो हर स्कूल की लड़किया पर्दा बाग में  मौसी की चाट खाती नज़र आती थी। पर्दा बाग के नाम से माँ बाप भी जाने की इजाजत आसानी से दे देते थे। वाकई पर्दा बाग लड़कियों के लिए  एक सुरक्षित  जगह थी। इतिहास  में  तो नही पढ़ा पर सुनते थे कि मुगलों द्वारा यह जनाना बाग बनवाया गया था।

 वहां  केवल पांच साल तक के लड़के अपनी माँ या बहन के साथ जा सकते थे। घने व विशाल वृक्ष थे इस उद्यान में खूब छायादार  बड़ा सा लॉन था ।  काफी मेंटन करके रखा था, रख रखाव तो दिल्ली नगर निगम ही किया करता था।

यूँ  तो हरियाली तीज हर साल ही आती पर उस वर्ष कुछ  खास था।  ताई जी की लड़की शादी के बाद पहला सावन करने मायके जो आई थी ।  यूँ  तो उसके बाद भी कई हरियाली तीज देखी थी पर अपने होशोहवास में  यह पहली बार था । 

जहाँ तक मुझे याद है कि नवविवाहिता दीदी को सावन के महीने मे घर लिवा लाए थे हरियाली अमावस्या के आते आते तीज मनाने की भरपूर तैयारी शुरू  हो गई थी । मठरी, गोजे, कचौरी आदि सूखे नमकीन और मिष्ठान्न बनाए जाने लगे थे।   बुआ मौसी मामी कुछ आस पड़ौस व दीदी के ससुराल वाले सभी को न्यौता जा चुका था। माँ ताई चाची सभी मिलजुल कर  तीज के कुछ दिन पहले से इसी तैयारी में  लगी थी । मुख्य फंक्शन तो घर में  होना था पर पर्दा बाग जाए बिना तीज का त्यौहार संपन्न न हो पाता ।  बस इसी की प्लानिंग चल रही थी कि कब क्या किया जाए।

भरा पूरा संयुक्त परिवार  था तीन बहुओ के दर्जन भर से अधिक  बच्चे मिसरानी और दो नौकर घर में हर समय ही गहमा गहमी रहती थी ऊपर से कोई तीज त्यौहार  आ जाए तो घर भर में  शादी का सा माहौल हो जाता था।

इस बार तो पर्दा बाग में  भी जाना था। वहां   तीज का  मेला  लगता  था। खास तौर पर दरियागंज और चांदनी चौंक  की औरतों और लड़कियों की भीड़ हुआ  करती थी ।

सुबह जल्दी  पहुँच कर  किसी विशाल घने पेड़ के नीचे जगह  पकड़ना जहाँ  पर बैठने के लिए बड़ी चादर या दरी बिछाई जा सके और किसी पेड़ की मजबूत  डाली को ढूंढना जिस पर अपना झूला डाला जा सके इस काम के लिए मिसरानी को पहले से ही तैयार किया जा चुका था , क्योंकि बाग में  लोहे की मजबूत सांकल से बनी पींगो पर झूलने के लिए तो लाइन लगाने के साथ लड़ाई झगड़े में भी महारत हासिल होनी जरूरी थी। और फिर कलात्मक पहलू भी सिद्ध होता था ।

‘सखी अंबुआ की डाली पे झूला झूलत है , आई बरखा बहार ‘ जैसी  कई कविताएं  अपने को सार्थक कर लेती थी ।

कल तीज थी और तैयारी अपने चरम पर थी हो भी क्यों न घर की सबसे बड़ी लाडली का  शादी के बाद पीहर में पहला सावन था । दिन भर तो औरतों की मौज मस्ती थी और रात्रि भोज में  पुरुषों को भी बुलाया गया था सो वह तैयारी भी करनी थी । 

सुबह सवेरे घर की बैठक  तथा बैठक के बाहर वाले दलान को झाड़ बुहार कर साफ कर लिया गया । बच्चों का बैठक में  जाना वर्जित ही था पर घर की स्त्रियां भी कम ही जाती थी क्योंकि दादा जी का कमरा भी यही था और बैठक का दीवान ही उनका पलंग था,

और मेहमानो केलिए भी यही कमरा था। दिवान सोफे और कुर्सियों पर हाथ की कढ़ाई किए हुए सफेद कवर चढ़ा दिए गये बदरंग सी मेज भी आज तो चकाचक सफेद  मेजपोश से ढक दी गई 

उस पर कढ़ाई किए गये बेल बूटे बहुत सुन्दर  लग रहे थे। आँगन के ऊपर बिछे 

लोहे की सींखो के जाल से रस्सियाँ डाल कर झूला भी डाल लिया गया ।

सुबह ग्यारह बजे से ही मेहमानों का आना शुरू  हो गया। कुछ  ही देर में  घर खचाखच भर सा गया बुआ मौसियां मामियां सभी अपनी बहु बेटियों के साथ पड़ौस की स्त्रियां दीदी की सहेलिया घर में औरतो का जमघट सा लग गया। सावन की बदरी भी आसमान पर छा गई। जीजाजी भी अपनी माँ और भाभी को लेकर आ गये। 

 दीदी भी बड़ी सुंदर लग रही थी हरे रंग की महीन सी साड़ी जिस पर गुलाबी रंग की छोटी बूटी कढ़ी थी गले में  हरे मीने के काम वाला पतला सा नेकलेस पहने बैठी थी बारी बारी से सब औरतों ने फूलों के गहने पहनाकर उनका श्रृंगार किया लगातार लोक गीतों की आवाज़ घर में  गूंज रही थी एक बंद होती तो दूसरी शुरु हो जाती। लता दीदी बड़ी दीदी के हाथीं में मेह॔दी के बेल बूटे रचा  रहीं थी। वही माचिस की तीली के साथ एक दूसरे को भी आपस मेह॔दी लगाई जा रही थी। उन दिनों मोबाइल कहाँ  होते थे।और इन छोटे छोटे फंक्शनों की फोटो लेना कोई जरूरी भी न था । फिर भी पड़ोस के बंटू भैया फोटो खींचने के शौकीन थे औरतों के जमघट में  खड़े हुए कनखियों से हम उम्र लड़कियों को निहारते हुए दीदी के दो चार फोटो ले ही गये। कब रील पूरी होगी  और धुलाई जाएगी और फोटो मिलेंगे कह नहीं सकते। पर मजा आ रहा था दीदी को सबसे खूब उपहार मिल रहे थे।पर्दा बाग जाने का इंतजार सबसे अधिक था। पर अभी तो सावन की सौगात खीर और मालपुआ खूब खाया जा रहा था 

दोपहर के दो बजे तक खाना निपटा तो अब पर्दा बाग जाने की तैयारी शुरू हो गई। बंद गली का आखिरी मकान था हमारा घर, भीतर घूमते घूमते गली इतनी छोटी हो जाती कि अंदर तक साइकिल  रिक्शा भी न आता। और पैदल चल कर ही घुमावदार गली पार करनी पड़ती। मैं  तो निकलने के इशारे के इंतजार में थी कि शूट लगाकर पर्दा बाग पहुँच जाऊं और जाकर अपनी पींग पकड़  लूं, फिर आज तो चाट वाली कई मौसियाँ  होंगी।

हालांकि घर में  भी चूड़ी वाले को बुलाकर सबको चूड़ियां चढ़ाई जा रही थी पर परदा बाग में  दुलारी  मौसी ईजितने प्यार  से चूड़ी चढ़ाती वैसे कौन पहनाता आज भी दुलारी मौसी का डॉयलाग याद है मिस्री घुली आवाज “अए बहुत दिनन में आई लाली दिखा  नया डिजाईन खूब जमेगो म्हारी लाडो की कलाइन पे”। एक हाथ से कलाई पकड़ती और दूजे हाथ की दो अंगुलियों में दर्जन भर चूड़ियां  लटकाती और बाकी तीन अंगुलियों से पल भर में  सारी चूड़ियां कलाइ में  पहना देती और 

 बच्ची की बिखरी लट सँवारते हुए कहती “ अए वाह खूब जंच रही हमारी लाली । 

   साइकिल रिक्शाओं में  बैठ कर आखिरकार सभी पर्दा बाग पहुँच ही गये।

मिस्रानी घने से पेड़ के नीचे दरी बिछाए जगह को पकड़े रखने के लिए कभी किसीसे तकरार तो किसी को प्यार से 

समझाते हुए अघा रही थी, और उधर उसकी दोनों बेटियाँ पेड़ पर डाला हुआ झूला सम्भाले खेल रहीं थी।

बुआ और मामी एक ही स्वर में ताई जी   से बोली “ अब तो मौसी की चाटो का  लुत्फ लेना है भई मैं तो बहुत दिनों बाद आई हूँ “। “ हाँ…हाँ क्यों  नही… ( ताई जी अपना बटुआ पकड़ाते हुए ) अब यही सब खाना… भुट्टे, पापड़, गोल गप्पे,अंकुरित मोठ की चाट, भूनी शकरकंदी की चाट और त्रिपता मौसी की फलों की चाट अमरक डलवा कर खाना  मत भूलना ,जिसको जो खाना हो मजे  से खाए,झूला झूले गीत भी गाते है।  आज हमारी बिटिया की  शादी के बाद पहली तीज है बस आप सब खुशियों  भरा आशीर्वाद दें हमारी लाडो खेलती खाती अपना वैवाहिक जीवन गुजारे।

पर्दाबाग मे ऐसे कई झुण्ड थे बस गीत गाने की आवाजें आ रही थी। हर कोई अपने झुण्ड में मस्ती में डुबा था। किसी के यहाँ  शादी की पहली तीज थी तो कोई परिवार के साथ कोई सहेलियों के समूह वैसे ही इकठ्ठे हो कर के आये थे । पेड़ों पर नये नये पत्ते आ रहे थे, गर्मी से मुरझाए बाग को  बरखा ने नया जीवन  प्रदान कर दिया था । सौंधी सी मिट्टी की महक ने हवा को ताजा कर दिया था । खाली अमराईया झूलों  से भर  गयी थी। वातावरण धुला सा लगता था। उन दिनों  प्रदूषण  शब्द  आम बोलचाल को भाषा में  नही था। अचानक से  अंबर में  काली बदली छा जाती और ऊमड़ती घुमड़ती घटाएं   कभी तेज बौछार तो कभी बूंदा-बांदी करके खाली हो जाती और फिर चांदी से चमकते बादलों के मध्य से नीला अंबर झांकने लगता । कुछ गीले होते कुछ सूखते से तीज के मेले का आनंद लिया जा रहा था। लॉन के तीन तरफ लाल पत्थर का रास्ता बना था जिसके एक तरफ सभी चाट वाली मौसियाँ बैठती और आज त्यौहार के दिन और भी मौसियाँ थी। खूब भीड़ थी उनकी तरफ भूनते भुट्टे, राख की हल्की सी आंच पर सिकती शकरकंदी चाट के मसालों की सुगंध ने वातावरण को मजेदार चटपटा बना दिया था। पत्तों में  भी चाट कर खाने का अपना ही मजा था । चूड़ी वाली मौसी के पास रंग बिरंगी खनऊ खनकती चूड़ियाँ तो देखते ही बनती थी।उन दिनों  जीवन मे सहजता अधिक  थी ।  जहां आज मशीनो के चलते भौतिक  सुविधाओं  की भरमार तो हो गई है पर उन्हीं सुविधाओं  को जुटाते रहने से जीवन के क्रियाकलापों में थकान महसूस  होने लगी है । रिश्तों मे भी सहजता शून्य  हो गई है। केवल औपचारिकता रह गयीं है। 

खुशगवार मौसम में  मिल बैठ कर खाना पीना गाना बजाना हंसी ठिठोली झूला झूलना ऐसा आनंद  है जिससे मन सहज हो जाता है। इसी तरह तीन चार घंटे कहाँ  बीते समय का आभास ही न रहा।  गर्मियों में शाम के छः बजे परदा बाग बंद हो जाता था, अब डंडा हाथ में  लिए चौकीदार घूम घूम कर सबको जाने के लिए कहने लगे और लोग भी समेटने में  लग गए। सावन में  महीना भर पर्दा बाग इसी तरह रौनक बनी रहती थी। हम लोग भी यदा कदा इसका आनंद  लेते ही रहते अधिकतर  सहेलियों के संग कभीकभार परिवार के संग ।

चाची ने तो अपनी याद को तरोताजा किया और बाकी लोगो ने सुनते सुनते दरियागंज के पर्दा बाग की सैर कर ली।

अनीता सोनी चेन्नई 

ग्रीष्म ऋतु

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मई का महीना चल रहा है। गर्मी ने हाय तौबा मचा रखी है। शाम होने को
है धूप का सम्राज्य अपने उतार पर है। नमी से भरी समुद्री हवा का भारीपन
महसूस हो रहा है। इस समय सोसाइटी में भी वॉक करने वालों की संख्या में
बढ़ोतरी हो रही है। चाची भी वॉर्किंग ड्रैस पहने कुछ सखियों के साथ मुस्तैदी से
पार्क में वॉकिंग कर रही है। सोसाइटी के अधिकांश बच्चे छुट्टियों में बाहर घूमने
गये है कुछ बच्चे छुट्टी मनाने चेन्नई में आएं हुए है।
वॉक करते हुए सामने से सरला जी आती दिखाई दी ,” कहाँ जा रही है सरला जी”
दूर से ही आवाज लगाते हुए चाची ने पूछा…. और तेज रफ्तार से चलते हुए
सरला जी के पास पहुँच गयी, “क्या बात है सरला जी कहाँ है? दिखाई ही नही
देती न कंपाउंड में न योगा क्लॉस में… सब कुशल मंगल…”! पसीने से तरबतर
कपड़ो में…. हाथ के तौलिए से मुहँ पोंछते हुए चाची ने पूछा।
“ सब ठीक है प्रभु कृपा बस आजकल घर में खूब रौनक लग रही है….बिटिया
के दोनों बच्चे आए हुए है और बहु अपने काम से टूर पर है बस चारों बच्चों के
संग कुछ ओर करने का समय ही नहीं मिल पाता इन्हीं के पीछे लगे रहना पड़ता
है…।“ (रूमाल से अपने मुंह को पोछते हुए) “ ऊपर से तो इस मुई गर्मी ने हालत
बिगाड़ कर रख दी है….पा पा बहुत गर्मी है।“ सरला जी ने कहा ।
“ भई वाह तो आजकल नाती पोतो की सेवा हो रही है।“ कहते हुए चाची मुसकुराई
“क्या कहूँ सेवा क्या करनी है…. आपको तो पता ही है घर में हर काम के लिए
मेड तो है ही पर इन बच्चों को संभालना ही एक बड़ा काम है सारा दिन कंप्यूटर
छोडा तो आई पैड या टेबलेट पकड़ लेंगे इन चीजो को छुपा दो तो फोन पर लगे
रहेंगे कुछ न हुआ तो टीवी…. एक मिनट के लिए एसी बंद नहीं रहता…खाना पीना
तो आपको मालूम है सारा जंक फूड ही खा कर राजी होते है बच्चे। बाहर आए तो
गर्मी का राग मैं तो षस इसी से थक जाती हूँ….सरला जी कहे जा रहीं थी ।
तभी हाथ में अपने कुछ खाने के पैकेट पकड़े सरला जी के पोता पोती और नाती
नातिन “चलो…चलो नानी चलो…चलो दादी का शोर मचाते हुए वही पर आ गये
कुछ आठ से बारह वर्ष की उम्र के बच्चे है। बस यूँ ही आजकल के बच्चों पर
चर्चा शुरू सी हो गयी सब लोग वॉकिंग खत्म कर चबूतरे पर आकर बैठ गये।
इसी बात पर हर कोई अपने अनुभव और सुझाव देने लगा। सरला जी ने बच्चों
को वहीं पार्क में बैठ कर अपना बर्गर खाने के लिए कहा चलो यही कुछ देर रहते
है बच्चों देखो कितनी अच्छी और ठंडी हवा चल रही है।
“ कहां नानी…. सब पिच पिच हो रहा है यहाँ अच्छा नहीं है अपन एसी में बैठते है”।
चाची को शायद टॉपिक मिल गया और किसी तरह बच्चों को अपने पास बिठा ही
लिया चाची को बच्चों से बात करते देख सोसाइटी के कुछ बच्चे जो पार्क में खेल रहे
थे दौड़ कर आ गये और चाची को सुनने लगे। “तुमको पता है यह हवा इतनी पिच
पिच वाली क्यों है…. ओर जानते हो प्रकृति के हर मौसम के फायदे होते है और यह
इसीलिए बने है कि सृष्टि का चक्कर सही से चल सके। हरेक मौसम का हमारे
जीवन पर प्रभाव पड़ता है। हम भारत में रहते है और भारत में सभी छः ऋतुएं
आती है। आज हम ग्रीष्म ऋतु के बारे में समझते है। तुम्हारे स्कूल में वॉटर
साइकिल के बारे में तो पढ़ा ही होगा”। चाची के इतना कहने पर कई बच्चे
हाँ में जवाब देने लगे कुछ के पास फोन था तो गूगल कर देखने लगे। अरे
बेटा गूगल मत करो देखो ग्रीष्म ऋतु में सूरज बहुत तपता है तो इस मौसम में
धरती का पानी समुद नदी तालाब इत्यादि से गर्म होकर भाप के रूप में ऊपर
उठने लगता है और बहुत ऊपर पहुँच ठंडे वातावरण में भाप छोटे छोटे बर्फ के कणों में
जमने लगती और जब यह जमे हुए भाप के कण इकट्ठे होकर बादल का रूप
ले लेते है और उड़ते उड़ते जब नीचे की तरफ आते है फिर से सूरज की तपन से
पिघलने लगते है और फिर से पानी के रूप में धरती पर बरसते है प्रकृति अपने
ही ढंग से धरती से उठाया हुआ गंदा पानी भी स्वच्छ करके बरसा देती है ।
सब बच्चे इतनी आसानी से बात समझ कर ताली बजाने लगे। तभी नमन अपना
फोन जेब में रखते हुए बोला “ no चाची जब तक आप इसकी हिन्दी में कविता
नही सुनाएंगे यह तो incomplete ही माना जाएगा। “ सभी बच्चे हाँ में हाँ

मिलाने लगे । अच्छा बाबा सुनाती हूँ प्यार से नमन को थपथपाते हुई चाची ने
कहा। तो बच्चों आज की कविता नाम है गर्मी का मौसम
गर्मी का मौसम
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हाय हाय गर्मी कितनी गर्मी ,अब के बरस तो बहुत है गर्मी।
झर झर तन से बहे पसीना , हरदम ठंडा ठंडा पीना।
हर बरस का यही फसाना , हर गर्मी का यही तराना ।
गर्मी की छुट्टिया जब आएं , बच्चे घर में ऊधम मचाए।
व्हाटसअप फेसबुक इंस्टाग्राम, पड़े सब यहीं सब तज के काम।
नकली प्रतिभा का ये रवैया , आदत में पक जाओ न भैया ।
आओ प्रकृति का नियम बताएं , कविता में विज्ञान को गाएं ।
गर्मी का जब मौसम आता , तपता सूरज आग बरसात ।
सागर सरिता का जल तप कर , वाष्प बन उड़ जाता ऊपर ।
वाष्पीभूत जब होता पानी , तैयार हो रही बरखा रानी ।
धरती पर है मची दुहाई ,गर्मी ने आफत खूब मचाई ।
सूख रहें है खेत खलिहान, पीत हुए वृक्षों के पात ।
आग बरसाते जेठ आषाढ़ , कैसे सहे गर्मी की मार ।
तरल तरल थे ताल तलैया , वाष्प हुआ जल बना सुरैया ।
उड़ गया दूर गगन के ऊपर , ठंडा होकर बना वो हिमकण ।
छोटे हिमकण हुए एकत्रित, बड़े मेघों में हुए परिवर्तित ।
आषाढ़ की होने लगी विदाई , काली घटा अंबर पे छाई ।
सावन का संदेश लाई , सौंधी मिट्टी मन को भाई ।
ऊमड़ घुमड़ कर बादल आए, इक दूजे से जा टकराए।
गड़गड़ गड़गड़ बादल गरजे ,चमचम चमचम बिजली चमके ।
मेघ बरसते मूसलाधार , हरियाली का हुआ विस्तार ।
भर गये सूखे ताल तलैया , भर भर जल को बहती नदियाँ ।
देखा प्यारे बच्चों तुमने ,कैसे प्रकृति हमें पालती ।
जो कुछ भी यह लेती हमसे ,कई गुणाकर दे डालती।
आओ प्रकृति का करें सम्मान, पर्यावरण का रखें ध्यान ।
हर ऋतु करती अपना काम , यही सिखाता हमें विज्ञान। अनीता सोनी चेन्नई मौलिक बाल रचना ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

‘ सुबह  हो गई ‘

                                                              ‘ सुबह  हो गई ‘

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अभी सुबह के चार बजे है। गली के एक कोने की पटरी पर नारियल पानी बेचने वाले पति-पत्नी अपनी दुकान लगा रहे है। साइकिल पर चाय बेचने वाले की पहली बोनी यहीं से होती है। अभी पांच भी नहीं बजे कि नारियल वाले की दुकान पर कुछ लोगों की शिरकत हो गई चाय वाले की ताजी और गर्मा गर्म चाय का दौर शुरू हो गया। दो दो कुरकुरे बटर बिस्कुट थमाते हुई चाय वाला खुद भी सुर्खी लगाकर चाय सुड़कने लगा। लक्ष्मी अम्मा और वल्लिअम्मा भी आ पहुंची। 

“क्या बात आज इतनी सुबह आ गई.”……. नारियल वाली ने पूछा। इतने दिन कहाँ थी दस नम्बर वाली रोज पूछ रही थी……..आज तो नयी कामवाली भेजने वाली थी वहाँ। ….

“अई ओ…. अक्का और दो चार दिन का बात है। अभी शनिवार को तो वोटिंग होगा ही बस फिर सब काम पर आ जायेगी न….अभी तुम बोल देना हम बिमार है।”….. लक्ष्मी अम्मा ने कहा।

“मेरा तो ससुर मर गया ऐसा कहना”…..हसँते हुए चाय में बिस्कुट डुबोते हुए वल्लिअम्मा बोली।

“तेरा अभी कोई  रिश्तेदार बचा है मरने को कितनी बार मारेगी सबको…मैं तो परेसान हो गई तुम लोग के वास्ते झूठ बोलते हुए”….नारियल वाली ने कहा।

“भई मजा है हम तो इधर में चौबीस घंटे का ड्यूटी में रहता हूँ तो हिल भी सकता नहीं वैसे कितना मिल रहा है….. आजकल रैली में…।“ सामने वाले बंगले के वॉचमैन ने चाय का कप कूड़ेदान में फेंकते हुए पूछा।

“ पार्टी की साड़ी, बिरियानी और चार-पांचसौ मिल जाता है।“…. लक्ष्मी अम्मा अपनी साड़ी से हाथ पोंछते हुए बोली।

“ अरे सब लोग चाय पी लिया क्या……?” दौड़ता सा सैल्वम आया “ हमको भी चाय दे दो अभी अभी रात का पार्टी खत्म 

हुआ अभी आखिरी गाड़ी भेज  कर आया….. रात भर म्यूजिक बज रहा था सिर फटने को है अन्ना जरा डबल चाय देना बड़े गिलास में…., इतना पिएगा  कि नहा ले सकता दारु में  अभी सब बॉटल भी उठाने का है नहीं मार्निग वाला वॉचमैन  लेकर जाता …….। आज तो अपना पीजा पार्टी  होगा आएगा क्या…..?  छः  सात डिब्बा  बचा रहेगा और गारलिक ब्रैड  भी …….”।

“पर मजा नहीं आता रबड़ के माफिक रहेगा …..  सारा पीजा ठंडा  होगा “ पहले वाले वॉचमैन  ने कहा ।

“मैं मेरे घर में माइक्रोवेव लाई …..  सो  होना तो दोपहर में  गर्म करके  देती “ नारियल वाली ने मुस्कुराते हुए  कहा ।

“अरे वाह कांग्रेसुलेसन वल्लिमा  हंसते हुई…..मैं भी  ट्राई  करती सो आने  का……।“  हंसते हुए……

अचानक गली के कोने पर पड़े बड़े से कूड़ेदान में आवाज आई सब का ध्यान उधर चला गया.। …”अरे…कोई उधर होता समझती मैं.”..।..नारियल वाली ने कहा सभी कूड़ेदान की तरफ लपके…..कौन!….कौन! गली की लाइट से कूड़ेदान कुछ  दूर था और अंधेरे की वजह से कुछ  साफ नहीं दिखाई  दे रहा…करीब से देखा तो कूड़ेदान के भीतर  आधी लटकी हुई औरत कंधे पर प्लास्टिक की बोरी डाले कूड़ेदान को टटोल रही थी। “तू कौन री इधर”…कुछ चिल्लाती सी नारियल वाली “ये तो कनमाँ ….कोनी (बोरी) आया का   एरिया  मैं जानती सो….तू कौन री ……”

कूड़ेदान में से बाहर निकलते हुए उलझे हुए  बालों के साथ छोटी सी कद काठी वाली दुबली सी औरत बोली “ माँ… मैं… कनमाँ का छोटा बहु होती… उन्हेंइछ इधर भेजा सो….कनमाँ ओढ़म सेरी इल्लै…सुबो सुबो  आना तो कुछ  मिलता सो…।“

 “खोदा पहाड निकला चूहा”…  सब वापिस  मुड़ लिए । चलते है कह कर तीनों  वॉचमैन ने अपना झाड़ू उठाया और अपने अपने बंगले पर जाकर झाड़ू देने लगे। चाय वाला अपने पैसे समेट साइकिल पर पैडल मारता ट्रिन…ट्रिन घंटी बजाता आगे बढ़ गया। वल्लि और लक्ष्मी  भी कुछ और औरतो को भी इकठ्ठा करना है कहकर सामने बड़ी सड़क पर बने फ्लाई ओवर के नीचे सोए लोगों की तरफ बढ़ गई। 

पति पत्नी ने दुकान  जमा ली थी। पति अपने स्कूटर पर इधर उधर नारियल बांधने लगा कालोनी के कुछ बंगलो  पर दैनिक  सप्लाई करनी होती थी सो अंधेरा छंटने पहले ही सब तैयारी पूरी कर ली थी अब पौ फटने का इंतजार था । तभी एक साइकिल रूकी। “अरे रमेश अन्ना आज इतनी तड़के”…..नारियल वाला।

“हां आज साहब को एयरपोर्ट छोड़ना है और नेपाल से भतीजा आ रहा है उसे लेना है। उसके माफिक काम हो तो बताना फिलहाल तो उसे ड्राइवर का काम भी सिखाना पड़ेगा। अभी के लिए कोई भी काम झाड़ू कटके का काम भी मिला तो चलेगा।“……रमेश  ने कहा।

पन्द्रह नम्बर में कुत्ते घुमाने का काम है आधा घंटा सुबह आधा घंटा शाम को तीन हजार महीना मिल जाएगा होना तो कल ले आना फिर कही गाड़ी सफाई  भी मिल जाएगा।  नारियल वाले ने कहा।

सुबह सुबह दूध और ताजा अखबार देने वाले  भी इक्का दुक्का लोग दिखाई देने लगे है।

पक्षियों का कलरव तेज हो गया है। कालिमा भी छंटने लगी है । ईशान की तरफ से गगन पर लाली छिटक रही थी। यूँ तो सीधी सड़क मरीना बीच को ही जाती है। कुछ तीन चार जवान  लड़के दौड़ लगाते  समुद्र की तरफ जा रहे है। सुबह की सैर वालों की आवाजाही भी शुरु हो गयी। 

सिवा मणि और जयश्री ने अपने दुपहिए स्कूटर को कालोनी के कोने पर पार्क किया और तेज गति से चलना शुरु कर दिया सामने से आते हुए अब्दुल और सायिदा दिखाई  दे गए। ये दो जोड़े रोजाना कॉलोनी के दोनों कोनों पर अपने अपने स्कूटर खड़े करते  और खूब बतियाते हुए वर्किंग करते है। दोनों तरफ बने सुन्दर बंगलो के आगे घने घने पेड़ो से घिरी  तकरीबन एक किलोमीटर लम्बी ये घुमावदार साफ सुथरी सड़क शहर के  बीचोबीच  वाकिंग करने की नजर से बहुत ही उत्तम समझी जाती है। आसपास की गलियों के लोग अक्सर  अपने दुपहिए कोने पर खड़े करके सुबह की सैर करते दिखाई  देते है। वह बात और है कि इस कॉलोनी के लोग यहाँ सैर नहीं करते  वे लोग  गोल्फ कोर्स , ई .सी .आर, जिम या फिर क्लब ही जाते है।

“अब तो इस गली में भी तीन-चार बंगले टूट कर फ्लैट बन गये है….।” सिवा मणि ने अब्दुल से कहा ।

“बन तो गये  मियाँ ……पर अपनी तकदीर  में कहाँ ……”। अब्दुल ने कहा ।

“क्या हुआ साईदा हिजाब  का….. आज तो हिजाब छोड़ दुपट्टा भी नही॔ लिया तुमने ….। “ जयश्री ने शरारत से पूछा ।

“अरे छोड न…. अब्दुल  की जेब में है दुपट्टा सैर करके पहन लूंगी वो तो मैं सास-ससुर की वजह से दो-चार दिन हिजाब पहन कर आती रही ….. अरे कितना मुश्किल  है हिजाब  पहनना और वो भी सैर करते हुए  तुझे क्या  पता तूं तो सैर भी जॉगिंग की ड्रैस  में करती है । सलवार कमीज़ तो फिर भी ठीक है ,पर बुरखे और हिजाब  में तो हालत ही खराब  हो जाती है ऊपर से नमी भरा मौसम हम भी इंसान है आखिर  ….. पर अब्दुल  तो बहुत समझते है इस बात को उन्होंने तो साफ ही कह दिया अम्मी अब्बू से जितना चाहे हल्ला  मचे पर मुझे कोई  फर्क नहीं पड़ता इससे, औरत भी आखिर इंसान है …..पहनावा मुहाज़िब होना चाहिए और आरामदेह भी और सलवार कमीज़ से बढ़कर मुहाज़िब और आरामदेह लिबास  औरतों के लिए और कोई नहीं है………।”कहते हुए  साईदा की नज़रें अब्दुल  को निहारने लगी ।

अब कालोनी में सैर करने वालों की संख्या बढ़ गयी थी । धीरे धीरे सुबह अपनी रंगत में आ रही थी ।कोई   लोग राजनैतिक चर्चा करते तो कोई अकेले अपने कानों में इयरफोन लगाए  अपनी अपनी मस्ती में सुबह की सैर का आनंद  ले रहे है ।

अब कुछ बंगलो की बालॅकनी में भी प्यालियाँ की खनक सुनाई दे रही थी और किसी किसी घर के आगे से गुज़रे तो फिल्टर  कॉफी की महक लुभा रही है । 15 नम्बर  वाले खुश  हो रहे थे कि कल से कोई  कुत्ते घुमाने के लिए कोई आ जाएगा। 22 नम्बर  वाले साहब अपनी ऑडी गाड़ी में एयरपोर्ट  की तरफ निकल चुके थे । 

10 नम्बर के मालिक   जानकीरामन अपने पुश्तैनी बंगले  की बालॅकनी  में बैठे अखबार  में मुहं गढ़ाए कॉफी की चुस्कियों  ले रहे है। भीतर पूजा घर में सुप्रभातम चल रहा है और बाहर पत्नी  का सुप्रभातम शुरू हो गया है।   “मैं कहती हूँ जी अब इतना बड़ा घर  मेंटेन  करना कितना  डिफीकल्ट  है । दोनों बच्चे तो स्टेट्स में सैटल हो गए , हम भी यहां फ्लैट  बना लेते है…कैश भी आ जाएगा और छोटे घर में नौकर लोग का खर्चा भी कम होगा …। ”  “ ऐ गायत्री अम्मा तुम्हारा  सुप्रभातम हुआ तो हमारा भजन सुन लो …हम तो  यहां पैदा हुआ  अभी मरकर  ही जाएगा …..तुम तुम्हारा  सुप्रभातम  रोज गाएगा हम अपना भजन रोज सुनाएगा ….,! 

19 नम्बर  में तो चर्चा अधिक  गंभीर है। मोहनलाल जी ने जीवन भर खूब कमाया इतना बड़ा बिजनेस  खड़ा किया  कई  जायदाद भी बनाई पर बड़ी उम्र  और बिमारी ने घर में बिठा दिया और  दोनों  बेटों ने  खूब ऐश मस्ती के साथ साथ खुद को बड़ा बिजनेस मैन साबित करने के चक्कर  में बिना सोचे समझे और  दूसरे धंधों में पैसा लगाया और अनुभवहीनता ने नीचे ला पटका  नये  धंधे  तो चले नहीं  और पिता द्वारा  लगाया बिजनेस  किस तरह बचाया  जाए ये नौबत आन पड़ी है। बेचारे मोहनलाल जी बहुत दुखी है। इस घर को बेच कर कही दूर  किसी नयी कॉलोनी में घर ले लिया जाए  और पैसा बिजनेस में डाल दिया जाए  वैसे भी बहुत भीड़ भरा इलाका हो गया है। बेटों के आगे मोहनलाल  जी  कुछ कहना चाहते है परन्तु अपनी शारीरिक  लाचारी के आगे मन मसोस कर रह जाते है। तो ठीक है इस घर को बेचने के लिए  दलाल को कह देते है।

सैर करने वालों की भीड़ अब कुछ  कम  होती सी लग रही है क्योंकि  दो बड़ी सड़को को जोड़ने वाली  इस छोटी सड़क पर भी ट्रैफिक  शुरू हो चुका है।  सूर्य भगवान  प्रतिपल  और अधिक चमकदार  होते जा रहे है। सुबह अपने पूरे रबाब में है। किसी घर में कोई  माँ बच्चों को दुलारते हुए  कह रही है उठो सुबह  हो गई  । किसी घर में खंगारते हुए  किसी बुजुर्ग  ने पूछा … क्या  सुबह हो गई? ….. कोई  चट से उठा और चिल्लाया  अरे सुबह  हो गई………..!

                                                       सूर्य के संग आती है आशा की किरण 

         अनीता सोनी चेन्नई 

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पोंगलो- पोंगल

             

सोसाइटी में  खासी रौनक है। सोसाइटी का कंपाउंड सुंदर सुंदर कोलम यानि  रंगोलियों से सजा हुआ  है। खूब चहल-पहल है। 

पोंगल के अवसर पर यहाँ कोलम डालने की प्रतियोगिता चल रही है। आज तड़के

ही स्नान से निवृत होकर नये नये कपड़ो में  लोग सजे धजे नज़र आ रहे है। स्त्रियों को देखे तो पट्टू सिल्क की साड़ी पहने माथे पर बिन्दी बालों में  ताजे मल्ली फूलों की वेणी महक रही है। खूब गहने पहने राजसी स्त्रियाँ लग रही है।  पुरुष भी परंपरागत वेशभूषा में  नजर आ रहे है। छोटे से ज़री  बार्डर वाली सफेद सिल्क या सूती वेस्टी के ऊपर चकाचक चमकती कलफ  लगी हुई कमीज कंधे के ऊपर अंग वस्त्र रखे हुए  है, माथे पर वैष्णवों का सीधा तथा शैवों का आड़ा त्रिपुंड भी सोह रहा है। अधिकतर छोटी लड़किया पट्टू पावड़े में  खेलती दिखाई दे रही है ।  पुराने समय में  तो गोबर से लीप पोत कर घर को नया किया जाता था पर अब वैसी बात नहीं फिर भी परंपरा को निभाने में  कोई कसर नहीं  छोड़ी  गयी है।

नये धान की फसल जो आई है।और कृषकों की धरती पर नयी फसल आना ही त्यौहार है। जहाँ  पोंगल  पकाने की तैयारी है, उस जगह को गोबर से लीपा गया है। तीन गन्ने एक दूजे संग टिका कर झोपड़ी का आकार दे दिया गया है और नीचे मिट्टी के चूल्हे पर रंग बिरंगी  मिट्टी की नयी हाड़ियाँ चढ़ी है फूल हार बांध कर किसी दुल्हन सी लग रही है । सूर्य नारायण की मंत्रोच्चार से पूजा शुरू  कर दी गयी। 

वाह! क्या दृश्य है अपनी लाली छिटकाते हुए  सूर्य भगवान के दर्शन  और एक लय में  मंत्रोच्चाण की ध्वनि,  हाथ जोड़  कर खड़े लोग! सकारात्मक ऊर्जा का वितरण सहज ही हो रहा है। मीठे और नमकीन पोंगल के लिए  दो  चूल्हों पर हाड़ियाँ चढ़ा कर तैयार रखी गई  है । अपने घरों से लाया हुआ मुट्ठी भर दाल चावल हर परिवार हांडियों में डाल रहा है। चूल्हों के भीतर सुलगते उपलों की आंच को  लकड़ियाँ धीरे धीरे पकड़ती जा रही है।

चूल्हों की कुछ  तेज होती आंच से हांड़ी में  उफान उठ रहा है नये धान की धवल झाग का उफान  अपने वेग से हांडी के ढक्कन को सरकाता हुआ बाहर निकल रहा है जिसके स्वागत में  पोंगला-पोंगल  के साथ करतल ध्वनि से पूरी सोसाइटी  गूंज उठी है। मालूम  नहीं ये क्यों किया जाता है ? शायद यही अन्न भगवान का  पूजन और सत्कार करने की विधि है।  नयी फसल की अन्न जल मिश्रित आहुति  अग्नि देव को स्वंय ही समर्पित हो रही है। 

माहौल ऐसा बना कि  कुछ औरते  पुराने तमिल लोकगीत गाने लगी है।

उधर सूर्य देव की लालिमा पिलिमा में  परिवर्तित  गयी है और मीठा व नमकीन  पोंगल दोनों बनकर तैयार हो चुके है। सोसाइटी के हॉल में नाश्ते के संग प्रसाद स्वरूप सबको वितरित किया जा रहा है। सुबह सुबह ।गरमागरम इडली वड़ा पोंगल सांभर व नारियल की चटनी के साथ  साउथ इंडियन कॉफी स्टील के कटोरी और ग्लास में  पीने का आनंद  ही कुछ ओर है। 

तमिलनाडु  में  पोंगल का त्यौहार तीन दिन तक मनाया जाता है। कल  सुबह गाय व बैल की पूजा की जाएगी फिर  रंगा रंग कार्य क्रम करने के लिए बाहर से कुछ लोगों को बुलाया गया है।  पोंगल के दूसरे दिन को माटु पोंगल कहा जाता है। और तीसरे दिन कान्नु  पोंगल  यानि घूमने फिरने पिकनिक  मनाने का दिन ।

उतर भारत में  भी इसी दिन मकर संक्रांति मनाई जा रही है। वहां  भी इसमें  मुख्य  तौर पर खिचड़ी ही होती है। खिचड़ी दान करना खिचड़ी  खाना खिलाना और पतंग उड़ाना।  यही  अनेकता में  एकता तो अपने देश की खासियत है । वैसे भी अपने देश में  खिचड़ी का महत्व बहुत है। ठाकुर जी के अन्नकूट में भले ही एक से एक भोग हो पर बिना खिचड़ी के छप्पन भोग भी पूरे नहीं माने जाते। तबीयत खराब हो तो खिचड़ी कुछ हल्का सुपाच्य खाने को मन करे तो खिचड़ी और घी से तर बतर खिचड़ी का स्वाद नींबू के आचार के साथ लाजवाब है।अपने देश की इस  महान सांस्कृतिक परंपरा के आगे नतमस्तक हो जाती हूँ। 

 वंदेमातरम भारत माता की जय 

               मकर संक्रांति 

     मकर संक्रांति का आया त्यौहार ।

         उतरमुखी हुए रविराय। 

       उतरायण का पर्व मनाए। 

  माघ महीना गंगा जमुना संगम स्नान।

    खिचड़ी तिल गुड़  करते दान ।

  औरो को खिलाए  खुद भी खाए।

        पड़े न पाले से रंग पीला।

    खाओ मूंगफली तिल गुड़ ढेला।

      खिली धूप और अंबर नीला।

    लगा आकाश में  पतंग का मेला ।

         रंग बिरंगी पतंगे उड़ती 

     ज्यों तितलियाँ बागो में फिरती।

         माझा डोर चरखी पतंग। 

         हर मन में  है भरी उमंग ।

       सब से ऊँची हम ही उड़ाए ।

        दूर गगन के पार ले जाएं। 

         हरी बैंगनी पीली लाल ।

         नीली ऊपर चढ़ती जाए ।

            नारंगी पीछे से आए ।

           काली ने कैंची चलाई 

         हरी बैंगनी काट गिराई।

         नारंगी आगे  बढ़ आई।

       नीली को है मात दिलाई।

        पीली हुई दोनों से तेज ।

      वाह तीनों में  लड़ गये पेच ।

     हर छत से बस शोर है आता 

    अरे इसे बचा अरे उधर बढ़ा ।

      अब दे दे तुनका काट गिरा ।

     कटी पतंग तो मच गया शोर ।

         बो काटे बो काटे बोल।

    आ उधर से पकड़ इधर को दौड़।

कटी पतंग  को लूटने, भागे इस-उस ओर

  किसके हाथ में आएगी पतंग की डोर । 

रंग बिरंगी पतंगो से फिर भी भरा आकाश।

  मकर संक्रांति का त्यौहार देता है संदेश।

जीवन में  हर्षोल्लास का हो सदा समावेश।

भले कुहासा बढ़ता जाए उतरायण तो आना है।

आशाओं की पतंग उड़ा कर खुशियों का दीप जलाना है।

अनीता सोनी चेन्नई 

लोह्ड़ी ,संक्रांति ,पोंगल

            

आज घरोंदा सोसाइटी में  सफाई धुलाई का  काम चल रहा है। हाँ भई पोंगल का त्यौहार आ रहा है। जिसे  मनाने की तैयारियाँ खूब चल रही है। चाची का चबूतरा भी अपने फुल ऐक्शन में  नज़र आ रहा है। गपशप करती औरतें,  खेल कूदकर खुद  को तरोताजा करते बच्चे। आजकल शाम को छः बजने से कुछ  पहले शाम गहराने  लगती है। जहां उतर भारत में  शीत लहर चल रही है वही चेन्नई  का मौसम अपने बेहतरीन समय में  है न कुहासे  से भरी सर्दी और न ही  उमस भरी गरमी शायद इसी को मीठी ऋतु कहते है और ऊपर से त्यौहार। उतर भारत  की लोह्ड़ी पश्चिम भारत का उतरायण मध्य प्रदेश उतर प्रदेश की मकर संक्रांति, उतर पूर्व का बिहू और दक्षिण का पोंगल । बस यही चर्चा  चल रही है। 

अपने देश की विविधता से भरी संस्कृति भी लाजवाब है। एक ही त्यौहार को हर क्षेत्र  में अलग रूप में  मानाया जाता है ।

माघ मास में  आने वाले यह  त्यौहार फसलों  से जुड़े  है। इस समय फसलों  की कटाई हो जाती है तथा नई फसल की बुआई  हो जाती है। पकी फसल को बेचकर किसान मालामाल होता है । 

जब जेब में  दाम हो मौसम खुशगवार हो तो त्यौहार  तो बनता ही है। कुछ पौराणिक कथाएं  जुड़ी है।  चूंकि अपना देश एक कृषि प्रधान देश है इसलिए यह सभी त्यौहार खेतीबाड़ी से जुड़े है।

आज तो लोह्ड़ी यानि आग जलाकर खुशी मनाते हुए  तिल की रेवड़ी, गजक मूंगफली 

गुड़ पोपकोन और नाचगाकर जाड़े का मजा लेने में  अपना ही आनंद है।

चूंकि चेन्नई के मौसम आग जलाने के लिए फिट तो नही है  पर महानगरों मे सब जगह के लोग आकर बस जाते है इसलिए  बड़े प्रेम से इन सोसाइटियों में  मिलजुल कर सभी त्यौहार मनाए जाते है। घरोंदा सोसाइटी  में  भी लोह्ड़ी, संक्रांति और पोंगल तीनो त्यौहार ही मनाए जा रहें  है।

आज चाची भी अपनी कविता के संग हाजिर है।

                      लोह्ड़ी 

 खड़ी फसल की हुई  कटाई।

नयी फसल की हुई  बुआई ।

 भरी किसान की जेब है भाई।

घर में  आई नयी भोजाई। 

पाले ने है धूम मचाई। 

हम भी मिलजुल धूम मचाएं ।

लोह्ड़ी का त्यौहार मनाएं।

आग जलाकर डाले भंगड़ा। 

ढोली ढोल बजाए तगड़ा। 

पहन रेशमी सलवार और कुर्ता 

सहेलियां डाल रही है गिद्धा। 

मक्की की रोटी सरसों का साग ।

मिलजुल कर सब तापते आग।

गजक मूंगफली तिल रेवड़ी, 

जुग जुग बनी रहे नयी जोड़ी।

दे-दे  अब तो लोह्ड़ी माई।

जुग जुग जीवे  तेरा जवाई ।

मुंडे  कुड़ियो दोनों आओ ।

सुन्दर मुंद्रिय मिलकर गाओ।

घर में  आई नई भोजाई ।

आज कंजूसी चले न माई।

दादा की हुई  बड़ी कमाई। 

अब तो लोह्ड़ी  दे-दे माई।

भरा हुआ  है तेरा बटुआ। 

दे दे नहीं  तो काटे अटुआ। 

कहीं  पोता कहीं पोती आई।

किसी की दुल्हन नयी ब्याही।

लाख लाख हो लोह्ड़ी की बधाई। 

बहुत  बधाई  बहुत बधाई लोह्ड़ी की हो बहुत बधाई। 

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अनीता सोनी चेन्नई 

                           

  नव वर्ष

     अपने अंतिम समय की तरफ खिसकता वर्ष  क्या सोच रहा है। बतिया रहा है खुद से अपना विशलेषण कर रहा है।   समय की सीमाओं बंधा समय कुछ कह रहा है। 

                

चलते है अब यार ! कहने लगा ये साल।

समय की गिनती में  आता हूँ , समय जो करे वही दिखाता हूँ। 

आया था मेरा  समय भी कभी , मैने भी कई ख्वाब सजाए थे।

खुशियाँ बिखेरूँ बहारें  लाऊं ख्वाबों की ताबीर करूँ हर मानस को खुश कर जाऊं। 

मेरा स्वागत  भी बड़ी धाम से हुआ था ।

कोई  झूमा था, किसी ने गाया था, कुछ छोड़ रहे थे पटाखे किसी  ने गुब्बारों को उड़ाया था ।

कोई नहाया  था  शराब में  कोई भक्ति में  सराबोर  था , बस  मेरे जन्म का चर्चा ही हर ओर था ।

हर कोई  आने वाले साल से नयी उम्मीदें जगा रहा था। 

साल का पहला क्षण खुशियों भरा हो खुद में  यही उमंग  जगा रहा था ।

नव वर्ष मंगलमय हो ,हैप्पी न्यू ईयर कहते कहते सब थकते न थे ।

सुन सुन कर मुझको भी खुद पर गुमान आ रहा था। 

मैं सभी की आशाओं को रोशनी दिखा रहा था। 

सब की उम्मीदों को पूरा करने का विश्वास खुद में जगा रहे था ।

पर नहीं कर पाया ! मेरी क्या बिसात समय से निकला हुआ एक कतरा मात्र!

बारह महीने सावन हफ्ते या फिर तीन सौ पैसठ॔ दिन

बस इतना ही था मेरा जीवन।

इतने से जीवन में सब को सब कुछ कैसे दे पाता।

जैसे मनुष्य हर इच्छा को पूरा नहीं कर पाता ।

मैं  भी  समय की सीमाओं में  बंधा एक कतरा हूँ मात्र  ।

शैशवावस्था से परिपक्वता तक और अनंत की गर्त में समाने तक लगातार हूँ यही क़यास ।

सफल हो सदा सबके प्रयास ।

दिये उम्मीद के जलाए रखना और करते रहना प्रयास। 

अच्छा तो अब में  जाता हूँ  तारीख बदल कर वापस आता हूँ। 

अनीता सोनी चेन्नई स्वरचित मौलिक रचना 

वीर बालक दिवस 26 दिसम्बर

        

 

 चाची के चबूतरे पर सब बच्चों का जमघट लगा हुआ  है । आएं जरा देखे क्या चल रहा है ।

अरे आज तो छोटे बड़े सभी बच्चें यहाँ  तक कि कॉलेज जाने वाले बच्चें भी दिखाई  दे रहे है।क्या  कुछ खास चल रहा है ह? हमेशा की तरह चाची चबूतरे पर बैठी है और सभी चाची को घेरे हुए  है।चाची कह रही हैं ,

” आज जानते है सब बच्चों को यहाँ क्यों बुलाया गया है। आज 26 दिसम्बर है। इस दिन को एक खास दिन घोषित किया गया है । ‘वीर बालक दिवस’ पिछले साल 2021 में  प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस दिवस की घोषणा की थी । बच्चों इस दिवस के पीछे 1704 ई• का एक इतिहास है जिसको कुछ खास नहीं पढ़ाया जाता…..” हाँ ….हाँ ….मैं जानता हूँ इसके बारे में ” उत्साह से भरा कॉलेज जाने वाला मनिंदर  कुछ कहना चाहता था। 

“हाँ …हाँ…कहो न मनिंदर “चाची ने कहा। 

“इस दिन सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के साहेबजादों को औरंगजेब द्वारा  शहीद किया गया था उनको श्रद्धांजलि देने के लिए  गुरुद्वारे में पाठ कीर्तन व लंगर किया जाता है।….और सिख धर्म में यह बहुत बड़ा दिन माना जाता है।

“पर इतिहास में  तो इसके बारे में  कुछ खास नही पढ़ाया जाता…। ” चेतन ने कहा 

” हाँ  क्योकिं साहेबजादों की शहीदी का इतिहास धर्म विशेष से जुड़ा है शायद इस लिए नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि भारत एक धर्म  निरपेक्ष देश है।” चेतन का दोस्त अमित बोल उठा ।

नेहा और  मनमीत एक स्वर में  बोल उठी… “पर ऐसा क्यों “? नेहा बात को पूरा करते हुए ….” पर हमारे देश में  धर्म की बात करना बुरा क्यों समझा जाता है चाची” 

“पर चाची साहेबजादों को शहीद क्यों होना पड़ा ….” नाक के ऊपर अपने चश्मे को ठीक करते हुए  वंदना ने पूछा ।

“मैं समझती हूँ  बच्चों में  यह जिज्ञासा उठना स्वाभाविक है। लगभग बारहवीं सदी में  भारत में  मुसलमानों आक्रमण किया और हमारे देश में  राज करने लगे तो जबरदस्ती वे भारतीयों को मुसलमान बनाने लगे उनके अत्याचार से डर कर कई लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन  भी किया आगे चलकर मुगलों ने भी यही किया। जबकि हिन्दु धर्म  की रक्षा की खातिर सिखों के नौवें गुरू श्री गुरु तेगबहादुर जी ने अपना शीश कटवा कर बलिदान भी दिया पर औरंगजेब के अत्याचार और बढ़ें तो सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने मुगलों के खिलाफ धर्म युद्ध  छेड़  दिया।

जिस युद्ध  में  उनके दो बड़े पुत्र अजीत सिंह जी और जुझार सिंह जी युद्ध  में लड़ते हुए  वीरगति को प्राप्त  हुए और उनके छोटे दोनों पुत्र फतेह सिंह जी और जोरावरसिंह सिंह जी को दीवार में  चिनवाया दिया गया। आज हम उन बहादुर वीरों की याद में  ‘वीर बालक दिवस ‘ इस लिए  मना रहे है हमारे देश के बच्चे इस जज़्बे को समझे तथा अपने राष्ट्र, धर्म  व परिवार  के प्रति सदा सजग वफादार व समर्पित रहें। “…….इससे पहले कि चाची कुछ और कहती  कि छोटे बच्चे  चार साहेबजादों की कविता सुनने की जिद करने लगे ।

“हाँ हाँ सुनो सुनो तो आज की कविता का शीर्षक  है

 26 दिसम्बर ‘वीर बालक दिवस’

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‘ वीर बालक दिवस’ 26 दिसम्बर 

आओ बच्चों प्यारे बच्चों आज तुम्हें हम कुछ बतलाएं 

भारत के इन वीर बालकों का  तुमको इतिहास सुनाएं।

शीश दिया पर धर्म तजा न कुर्बानी की कथा सुनाएं ।

आक्रान्ताओं का था साम्राज्य अपने धर्म पर लगी थी घात ।

अत्याचार कर कुचला जाता जो करता धर्म  की बात।

दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी धर्म युद्ध करते थे ।

पिता  गुरू तेगबहादुर सिंह जी के पथ पर चलते थे।

चारों साहिबजादों को भी पाठ यही पढ़ाया था ।

खा झूठी कसम निज धर्म की मुगलों  ने धोखा दिया ।

आनंद पुर साहिब का दुर्ग गुरु गोविंद सिंह ने छोड़ दिया ।

चाल चली दुशमन ने ऐसी परिवार एक दूजे से बिछड़ गया ।

मात्र 43 की फौज का मुगलों  से युद्ध छिड़ गया ।

साहेबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह रण में हुए शहीद थे। 

साहेबजादे फतेहसिंह और जोरावरसिंह सिंह भी बहुत  निर्भीक थे।

माता गुजरी सहित दोनो को वजीर खाँ ने पकड़ लिया। 

पौष मास की शीत रात्रि में ठ॔डे दुर्ग में बंद किया।

सिपहसलारों ने समझाया तुम इस्लाम कबूल करों। 

कलमा पढ़ मोमिन बन जाओ और कष्टों को तुम दूर करों। 

उत्तर दिया साहिबजादों ने यूँ धर्म न अपना खोते है।

दशमेश पिता के पुत्र है हम गुरु तेगबहादुर के पोते है।

वजीर खाँ ने आ धमकाया और प्रेम  से भी फुसलाया। 

जांबाजो के जज़्बे के आगे कुछ भी न था काम में  आया।

गरजे वह सिंह  की दहाड़ से,

गूंजे थे शब्द दिशाओं को फाड़ते।

तजे नहीं  निज धर्म  को हम चाहे कितने कष्ट  सहे ।

भले शीश कलम हो जाए पर कलमा न हम पढ़े। 

साहेबजादों की सुन प्रतिज्ञा वजीर खाँ था गुस्साया।

ज़िंदा दिवार में चिनवाने का जालिम ने फरमान सुनाया ।

नौ और पाँच वर्ष मात्र अवस्था  बच्चों  की थी।

पर्वत को जो नीचा करदे हिम्मत उन वीरों की बड़ी थी ।

 जब दीवार में  चुन रहे ज़ालिम जल्लाद थे।

वीर बालकों  के मुख से निकल रहे यही उदगार थे ।

‘ बोले सो निहाल सत् श्री  अकाल’

 ‘बोले सो निहाल सत् श्री अकाल’ !!!

कहते कहते यही दिवार में  साहेबजादे बन्द हो गये ।

जालिमों जल्लादों के कानों आवाज यही अब गूंज रही थी।

करने को अपनी तस्सली दीवार को था

 गिरा  दिया । 

 सिंह सपूत बेहोश पड़े देखा तो ज़ालिम घबराएँ। 

क्रूरता की पराकाष्ठा बन वीरों पर बरपाए।

ले तलवार उसी क्षण में धड़ से शीश अलग किया।

पर इतिहास में सदा के लिए साहेबजादो को अमर किया। 

घटना यह घटी 26 दिसम्बर सन् 1704 को।

शीश नवाते है हम वीरों वीरों के अवतार को।

26 दिसंबर को सदा ‘वीर बालक’ दिवस मनाते है।

अडिग रहें  हम धर्म पर अपने जज़्बा यही जगाते है।

अनीता सोनी चेन्नई 

‘बसंत पंचमी’ एक याद

                               

आज तो चाची के चबूतरे पर भी रौनक है। वसंत पंचमी मनाई जा रही है। बच्चे और बड़े सभी इधर उधर घूमते फिरते दिखाई दे रहे है। अब लॉकडाउन नहीं होगा ऐसा सरकार की तरफ से ऐलान हो गया है। और सभी स्कूल भी खुल गए है। कुछ बच्चे तो स्कूल बहुत चाव से जा रहे है , और कुछ के लिए मुसीबत लग रही है।
“आज तो कुछ मजेदार होना चाहिए”। चाची की तरफ देखते हुए ललिता ने कहा ।
“इतने स्वादिष्ट मीठे चावल तो आपने खिलाए अभी तक केसर की खुशबू महक रही है कोई मीठी सी बात भी सुनाओ न चाची आज तो बसंत पंचमी है । “ अपने बालों की वेणी को ठीक करते हुए सुजाता ने कहा।
“ मैं अपने बचपन का एक मीठा सा अनुभव सुनाती हूँ । आज के समय से तुलना करो तो ऐसा लगता है कि वह भी क्या जमाना था जिसको सच में जिया था पर आज सपने जैसा लगता है……” कहते कहते चाची ऐसा लगा जैसे किसी सपने में खो गई हो।
सन् 1970 की बात है, दादाजी के बचपन के दोस्त पंजाब के किसी गाँव में रहते थे , जो कई वर्षों से नहीं मिले थे दोंनो बुजुर्ग हो गये थे। । वे दादाजी से मिलना चाहते थे। ऐसा उनके बेटे का खत आया था । ताकीद की गई थी , कि जल्द ही मिलें । चिठ्ठी पढ़ कर दादाजी काफी भावुक हो गए और आनन फानन में वहाँ जाने की तैयारी हो गई। बस इसी बहाने हमें गाँव जाने का मौका मिला । तब से पहले मैंने कभी गांव नहीं देखा था। अभी कुछ दिन पहले ही लोहड़ी और माघी के त्यौहार गए थे । अपने आने की सूचना दादाजी ने पोस्ट कार्ड द्वारा भेज दी । दिल्ली से लुधियाना तक रेलगाड़ी और वहाँ से बस लेकर भारतीय सीमा पर बसा एक छोटा सा पिंड़ था जहाँ हम उतरे । उनके बेटे बस स्टॉप पर हमें लेने आए हुए थे । उन्होनें ने हमें टांगे पर बिठाया और अपने घर ले गये । उस दिन ही बसंत पंचमी थी और खूब सर्दी भी दोपहर का समय था हल्की हल्की रेशमी धूप थी । आसमान रंग बिरंगी पतंगों से सराबोर था तब पता लगा कि बसंत पंचमी के दिन पंजाब में खूब पतंग उड़ाई जाती है। यहाँ भी घर भर के बच्चे और पुरुष पतंग बाजी में लगे थे । संयुक्त परिवार था घर की स्त्रियां रसोई में ही लगी थी कहीं केसरी मीठे चावल सरसों का साग मक्की की मोटी मोटी रोटी घर का बना घी और मीठे के नाम पर घी शक्कर वाली रोटी या गाजर का हलवा घर की बनी पिन्नियाँ धूप में बैठ कर काली गाजर की कांजी का सेवन वाह….! घर के बड़े से आहते में ही एक तरफ कुछ गऊएँ और भैंसें बंधी थी और दूसरी तरफ जमीन में पीली पीली सरसों लहलहा रही थी। किनारे की क्यारियों में हरे हरे मटर लगे थे और इतनी हैरानी हुई कि किनारे पर बनी मेढ़ में मूली लगी हुई थी । हमारे लिए यह सब बहुत नया था। चचेरे दादाजी की एक पोती रंजीता मेरी हमउम्र थी सो वह मेरी सहेली बन गयी वह सब खेल खेल में दिखला रही थी जब उसने मेढ पर बाहर झांकते पत्तों को खींचा तो इतनी लम्बी मूली निकली……वाह…! जो कि मेरे लिए किसी अजूबे से कम न था उसे धोया और खाया जिसका स्वाद मुझे आज तक याद है। मैंने सोचा कि यह लोग किसान है और यही इनका खेत होगा पर रेजीता ने बताया कि यह तो उनके घर के लिए है। उनका खेत तो यहाँ से दूर है बहुत दूर तक चलना पड़ता है, और खेत के पास ही बसंत का मेला लगा है। कल सब मेला देखने जायेंगे । उसने बताया कि मेले में जाने की खूब तैयारी है । रंजीता ने बड़े उत्साहित होते हुए मुझे रेडियो दिखाया हर कमरे में अब बल्ब लगें है और इस गर्मी में पंखा भी लग जाएगा उसके बाऊजी ने वादा किया है। मुझे इसमें इतना उत्साहित होने की वजह समझ नहीं आई हमारे घर में तो अभी टेलीविज़न भी आ गया है। रेडियो तो हम जन्म से ही देख रहे है। इसमें इतना खुश होने की क्या बात है। फिर पता चला कि इनके गाँव में दो तीन महीने पहले ही बिजली आई थी जिसके चलते सब लोग बहुत उत्साहित थे। पूरे घर में चारपाईयाँ और सरकंडे के मोढ़े और रस्सी से बुनी पीढ़ी के अलावा और कोई फर्नीचर नहीं था । औरते शाल और आदमी लोग कंबल ओढ़े रहते थे । कुछ सर्दी का मौसम और कुछ पानी का असर खाया पिया तुरंत पच जाता था और बार बार भूख लग जाती थी । अगले दिन सबने मेले में जाना था इसलिए लड़किया तो शाम होने से पहले ही अपनी तैयारी में लग गई और लड़के तो पतंग उड़ाने में व्यस्त थे। लड़कियों ने मिलजुल कर बारीक गोटा लगे सफेद मलमल के दुपट्टों को कच्चे पीले रंग में रंग लिया अपने सूटो के साथ मैचिंग स्वैटर व शाले॔ सभी कुछ तैयार कर लिया गया। वह घर पिंड के कुछ गिने चुने घरों में था जिसके पिछवाड़े में स्नानागार तथा शौचालय की व्यवस्था थी ।

अगले दिन सब सुबह उठकर हैंडपंप के गुनगुने पानी से स्नान कर तैयार हो गए और पराँठे मक्खन और और दूध के बड़े बड़े गिलास जिनको पंजाबी में पेंदी वाले गिलास कहा जाता है। अच्छी तरह से सब खा पी कर मेले की ओर निकल पड़े थे ।
रास्ते में पिंड के और कोई इक्का दुक्का छोटे बड़े समूह उस धूल भरी पगडंडी पर नज़र आ जाते थे जिनको वह हमारा परिचय देते ‘साढे दिल्ली दे परौणें’ यानि हमारे दिल्ली के मेहमान। वाहन सुविधा के नाम पर कुछ खास ना था दूर से धूल उड़ाता एकाध टांगा या फिर चिर्र चिर्राती चलती साइकिल रिक्शा या कोई एकाध नवविवाहित जोड़ा मस्ती में साइकिल पर सर्र से निकल गया । आसपास सरसों के खेत जिन पर लहलहाती पीली सरसों जैसे पीले रंग का गलीचा बिछा हो या फिर हरे हरे गेंहूँ के खेत जिनकी नर्म नर्म नन्हीं बालें उगनी शुरू हो चुकी थी जिनका ज्ञान मुझे रंजीता ने करवाया। मैं तो यह सब पहली बार देख रही थी । वहाँ पक्षियों का कलरव भँवरों की गुंजन कोयल की सुरीली कूक यह सभी था आज सोचने से सब याद आता है परन्तु उन दिनों अल्हड़पन में कुदरती संगीत का आनंद नहीं मालूम था ।

खेतों के बीचों बीच गुजरती धूल भरी कच्ची पगडंडी पर चलते हुए खेत के किनारे पर एक ऊंचा सा चबूतरा जिसके चारों तरफ तीन तीन चाप बने थे ऐसी मेहराबदार छतरी को बारादरी कहते है । यह मुझे रंजीता ने बताया तब पता चला कि आते जाते राहगीरों के सुस्ताने के लिए इसी तरह कहीं कोई भला करने के इरादे से ऐसा मेहराबदार चबूतरा बना देते थे जिसको बारादरी कहते थे । वहाँ कुछ देर बैठ कर कुछ हल्का चना मूँगफली खाया और आगे चल पड़े वही पास रहट से बंधे बैल घूम रहे थे । बैलों के घूमने पर उनके गले बंधी घंटियों का संगीत और रहट में लगी बाल्टियों का नीचे पानी भरना और ऊपर लाकर उडेलना एक अलग सा संगीत बजा रहा था। वहां से जाने को मन ही न चाहता था। सतलुज नदी भी दिखाई दी दूर से रंजीता ने बताया कि नदी के दूसरी तरफ पाकिस्तान है। कुछ देर और चले तो कुछ लोग दिखाई देने लगे पक्की सड़क आ गई जिसके दोनों तरफ दूर तक फैले खेत ही खेत दिखाई देते थे और उस पर फूली पीली पीली सरसों ऐसा लगता था जैसे पूरी धरती पीले रंग की हो । प्रकृति ने मुझे सदा आकर्षित किया है शायद इसीलिए वह दृश्य मेरे भीतर आज भी तरो-ताजा है।
वहीं सड़क के किनारे मैदान में मेला लगा था आसपास के और भी कई छोटे छोटे पिंडों के लोग थे क्योंकि मेले में खासी भीड़ लग रही थी । रंग बिरंगे कपड़े पहने औरतों और बच्चों की खूब भीड़ थी। लंबे चौड़े सिर पर पगड़ी बांधे हाथ में लठ्ठ लिए जाट किसान अपने परिवारों के साथ घूम रहे थे अधिकतर स्त्रियों ने पीला दुपट्टा और पुरुषों ने पीली पगड़ी पहन रखी थी ।
मेले मैं खूब रौनक थी हाट बाजार में सभी कुछ बिक रहा था आम जरूरत का हर सामान और खरीदारों की तो भरमार थी । कहीं ढोली ढोल बजा रहे थे लोग भागँड़ा कर रहे थे । पंजाबी में बोलियाँ डाल कर लड़कियाँ गिद्धा कर रही थी। खाने पीने के खूब खोमचे वाले खड़े थे तरह तरह की खाने की चीजे बिक रही थी ।रंजीता ने मुझे एक बात बताई कि उनके गांव में केवल दो ही हलवाई की दुकान थी जहाँ पूरी छोले,समोसे, जलेबी और शाम के समय पकौड़े बनते थे और दूसरे कं पास दूध दही मावा या कभी कभार बर्फी मिलती थी । बाकी मिठाइयाँ तो तीज त्यौहार पर ही मिलती थी । इसलिए जब कोई मेला लगता तो लोग खूब खाते पीते थे ।कुछ लोग मेले में कई तरह के खेल करतब भी दिखा रहे थे । मेले का सबसे बड़ा आकर्षण था बाइस्कोप जिसको देखने के लिए लम्बी लाइन थी। हमने भी लाइन में लग कर बाइस्कोप देखा तो हंसी सी आ गई कहाँ दिल्ली के वातानुकूलित पिक्चर हॉल का और कहाँ ये डिब्बा । उस समय कहाँ ऐसा सोच सकते थे कि कोई समय आएगा कि बाइस्कोप का भोंपू हाई फाई घरों के ड्राइंग रूम की शान होगा।
सारा दिन मेले में घूमने के बाद शाम होने से पहले ही घर का रूख कर लिया क्योंकि समय से घर भी पहुंचना था । रंजीता ने बताया कि अभी तो मेला एक महीने तक चलेगा और वह लोग दो तीन बार और आएंगे । रंजीता को भी इच्छा थी कि वह भी दिल्ली जाए बड़ा शहर देखने की और शहरी जीवन जीने की उसकी दिली तमन्ना थी । जब वे बात बात में कहती कि……………

“ हाँ तुस्सी ते दिल्ली जेहे बड्डे शहर विच रहेंदे हो आपां तां छोटे जेहे पिंड विच रहेंदे हाँ। कहते कहते उसका मुँह थोड़ा छोटा हो जाता एक हीन भाव सा आ जाता और मैं मन ही मन फूलने लगती और उसे गर्व से मुस्कुरा कर कहती तुम दिल्ली आना ना हम तुमको खूब घुमाएंगें । तब उसकी सादगी मुझे फूहड़ता लगती और उसकी अनभिज्ञता उसका भोलापन उसकी अज्ञानता लगती और खुद को मैं खूब हाई फाई और आधुनिक समझती ।
हम लोग दो दिन बाद दिल्ली वापस आ गये परन्तु मुझे वह गांव वह पगडण्डी वह बारादरी वह खेत और रहट
कभी नहीं भूले। सबसे यादगार वह मेहमान नवाज़ी जो पंजाबियों की खासियत है। भले ही साग रोटी खिलाएं परन्तु इतना अपनाप होता है कि भूख न होने पर भी इनसान खाने को ललचा जाता है। जब से बसंत और पतझड का अंतर समझ आया तो यह भी समझ आया कि सुविधासम्पन्न होना सुखी होना नहीं है जहाँ आत्मीयता होती है अपनापन होता है वहाँ मन में तसल्ली होती है और वही सुख है ।
अनीता सोनी